मेरे प्यारे नबी

आपकी बेसत1 और दावत

सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब सैंतीस साल के थे, तो ग़ैब से आपको “ऐ मुहम्मद!” कहकर पुकारने वाली आवाज़ें सुनाई देती थीं। अड़तीस साल के हुए तो आप कुछ नूर देखने लगे। अपने ये हालात आप सिर्फ़ हमारी माँ हज़रत ख़दीजा को बताते थे। जब मुहम्मद अलैहिस्सलाम को नुबुव्वत की ख़बर दिए जाने का वक़्त क़रीब आ रहा था (उससे तक़रीबन दस साल पहले), तो उस ज़माने के मशहूर अदीबों में से क़ुस इब्ने साइदा ने उकाज़ के मेले में ऊँट पर बैठकर एक बड़ी भीड़ के सामने जो ख़ुत्बा दिया, उसमें आपके आने की ख़ुशख़बरी दी थी। हमारे प्यारे नबी भी इस ख़ुत्बे को सुनने वालों में मौजूद थे। क़ुस इब्ने साइदा ने अपने इस मशहूर ख़ुत्बे के एक हिस्से में यूँ कहा है:

“ऐ लोगो! आओ, सुनो, इंतिज़ार करो, इबरत हासिल करो! जो ज़िंदा है, वह मरेगा; जो मरेगा, वह फ़ना हो जाएगा; जो होना है, वह होकर रहेगा!… कान लगाओ, ग़ौर से सुनो! आसमान में ख़बर है, ज़मीन में इबरत लेने की चीज़ें हैं!… अल्लाह के नज़दीक एक दीन है!… और अल्लाह के एक नबी आने वाले हैं। उनका आना बहुत क़रीब है। उनका साया तुम्हारे सिरों पर आ पड़ा है। उनकी बात सुनने वाले और उन पर ईमान लाने वाले कितने मुबारक हैं! हाय उस बदबख़्त पर जो उनकी नाफ़रमानी और मुख़ालफ़त करे! अफ़सोस है उन उम्मतों पर जिनकी उम्रें ग़फ़लत में गुज़रीं!…”

उस वक़्त अरब में लोग इलाही पैमानों से दूर हो गए थे और अमीर-ग़रीब, ताक़तवर-कमज़ोर, आक़ा-ग़ुलाम जैसे तबक़ों में बँट गए थे। ऊपर के तबक़े नीचे वालों को अपने दबाव तले कुचलते थे और उन्हें इंसान भी न समझते थे। कमज़ोरों का माल ज़बरदस्ती छीन लिया जाता था, और इसे रोकने वाला कोई हाकिम न था। अल्लाह तआला पर ईमान से पैदा होने वाली हया और ख़ौफ़ से महरूम होकर वे फ़ज़ीलत से बहुत दूर हो चुके थे। हर तरह की बदअख़लाक़ी, इज़्ज़त और आबरू को पाँव तले रौंदने जैसी घटिया हरकतें खुलेआम होती थीं; जुआ, शराब और ऐश-ओ-इशरत की महफ़िलें ज़रा भी अजीब न समझी जाती थीं। लगातार होने वाले क़त्ल, ज़िना और लूटमार के वाक़िआत ने चारों तरफ़ तबाही मचा रखी थी, बेगुनाह इंसानों की आहें और दर्दनाक चीख़ें अर्श तक गूँजती थीं। अख़लाक़ी लिहाज़ से पूरी गिरावट छाई हुई थी, लोग जहालत के समुंदर में डूब रहे थे। औरत को एक मामूली माल की तरह ख़रीदा और बेचा जाता था; बच्चियों को बेरहमी से ज़िंदा ज़मीन में गाड़ दिया जाता था। सबसे बुरी बात यह थी कि ये सख़्त दिल, ज़िद्दी और रहम से दूर लोग अपने हाथों से बनाए हुए उन बुतों की पूजा को, जो न नफ़ा पहुँचा सकते थे न नुक़सान, बड़ी इज़्ज़त की बात समझते थे।

आदम अलैहिस्सलाम से लेकर अब तक दुनिया में ऐसी वहशत, गुमराही, बदअख़लाक़ी, बेएतिक़ादी और अय्याशी नहीं देखी गई थी। लोग गोया दरिंदों का रूप धार चुके थे। हर कोई एक-दूसरे का दुश्मन था, समाज हर पल फटने को तैयार था। लोगों को सुकून मिले, इसके लिए इस अँधेरे में सआदत का एक सूरज निकलना ज़रूरी था। उसके निकलते ही बेएतिक़ादी की जगह ईमान, ज़ुल्म की जगह इंसाफ़ और जहालत की जगह इल्म ले लेता, और लोग हमेशा की सआदत पा लेते।

आख़िरकार हमारे प्यारे नबी को पहले सच्चे ख़्वाब दिखाए जाने लगे। हदीस शरीफ़ में बताया गया है कि वह्य की शुरुआत सबसे पहले सच्चे ख़्वाब से हुई। आप ख़्वाब में जो कुछ देखते, वह हूबहू सामने आ जाता। यह हालत छह महीने रही। वह्य आने का वक़्त क़रीब आया तो “ऐ मुहम्मद!” कहने वाली आवाज़ें बढ़ गईं। इसके बाद आप तन्हाई पसंद करने लगे और लोगों से दूर होकर हिरा पहाड़ के एक ग़ार में ग़ौर-ओ-फ़िक्र में डूबने लगे। कभी-कभी आप मक्का आते, काबा का तवाफ़ करते और अपने मुबारक घर तशरीफ़ ले जाते। मुबारक घर में कुछ देर ठहरकर थोड़ा खाना साथ लेते और फिर हिरा पहाड़ के ग़ार में लौट जाते, ग़ौर-ओ-फ़िक्र और इबादत में मशग़ूल रहते। कभी-कभी आप वहाँ कई-कई दिन रहते। उस वक़्त हज़रत ख़दीजा खाना भेज देतीं या ख़ुद ले जाती थीं।2

मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने हजर-ए-असवद को अपने मुबारक चोग़े पर रखा और फ़रमाया: “हर क़बीले से एक आदमी इसका एक किनारा पकड़ ले” हमारे प्यारे नबी मुहम्मदुल अमीन (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

पहली वह्य

नबी-ए-करीम जब चालीस साल के थे, तो फिर एक रमज़ान के महीने में हिरा पहाड़ के ग़ार में जाकर ग़ौर-ओ-फ़िक्र में डूबे हुए थे। रमज़ान की 17वीं, पीर की रात, आधी रात के बाद आपने अपना नाम लेकर पुकारने वाली एक आवाज़ सुनी। सिर उठाकर चारों तरफ़ देखा तो दूसरी बार वही आवाज़ सुनी और देखा कि अचानक एक नूर ने हर तरफ़ को ढाँप लिया है। उसके बाद जिबराईल3 अलैहिस्सलाम आपके सामने आए और कहा: “पढ़ो!” नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ!” तब फ़रिश्ते ने आपको पकड़कर इतना भींचा कि आपकी ताक़त जवाब देने लगी, और कहा: “पढ़ो!” आपने फिर जवाब दिया: “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ!” फ़रिश्ते ने आपको एक बार और भींचा और कहा: “पढ़ो!” आपने फ़रमाया: “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ!” तो फ़रिश्ते ने आपको तीसरी बार भींचा। फिर छोड़ दिया और सूरह अलक़ की वे पहली पाँच आयतें लाए जिनका मफ़हूम है: “(ऐ मुहम्मद अलैहिस्सलाम!) हर चीज़ को पैदा करने वाले अपने रब अल्लाह के नाम से पढ़ो! उसने इंसान को जमे हुए ख़ून (अलक़) से पैदा किया! पढ़ो, अल्लाह बड़े करम वाला है! वह क़लम से सिखाता है, जो नहीं जानते थे, वह सिखाता है।”4 मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने भी उनके साथ पढ़ा। पहली वह्य इस तरह आई, और सारे जहान को रौशन करने वाला इस्लाम का सूरज इसी तरह निकला।5

रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बड़ी कँपकँपी और जोश के साथ हिरा पहाड़ के ग़ार से निकले और नीचे उतरने लगे। पहाड़ के बीच में पहुँचे तो आपने एक आवाज़ सुनी। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “ऐ मुहम्मद! आप अल्लाह तआला के रसूल हैं, और मैं जिबराईल हूँ।” और अपनी एड़ी ज़मीन पर मारी। जहाँ एड़ी मारी थी, वहाँ से पानी निकला, और वह वुज़ू करने लगे। नबी-ए-करीम उन्हें ग़ौर से देखते रहे। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने वुज़ू पूरा करके नबी-ए-करीम से कहा कि आप भी उसी तरह वुज़ू करें जैसे आपने देखा। जब हमारे प्यारे नबी ने वुज़ू पूरा कर लिया, तो जिबराईल अलैहिस्सलाम इमाम6 बने, और दोनों ने दो रकअत नमाज़ अदा की।

इसके बाद जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “ऐ मुहम्मद! आपके रब ने आपको सलाम भेजा है!” और फिर बताया कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: “तुम जिन्नों और इंसानों के लिए मेरे रसूल हो। तो उन्हें तौहीद की दावत दो।” फिर वह आपसे जुदा होकर आसमान की तरफ़ बुलंद हो गए। इस तरह हमारे प्यारे नबी ने जिबराईल अलैहिस्सलाम को देखा भी और उनसे बात भी की।

पत्थरों और पेड़ों का सलाम

अपने मुबारक घर पहुँचने तक नबी-ए-करीम जिस पत्थर और जिस पेड़ के पास से गुज़रते, उससे यह आवाज़ सुनते: “अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!” घर पहुँचकर आपने फ़रमाया: “मुझे ढाँप दो! मुझे ढाँप दो!” और कँपकँपी दूर होने तक आराम फ़रमाया। फिर जो कुछ देखा था, वह हमारी माँ हज़रत ख़दीजा को सुनाया और फ़रमाया: “जिबराईल (अलैहिस्सलाम) मेरी नज़रों से ग़ायब हो गए। लेकिन उनका रोब, उनकी शिद्दत और उनका ख़ौफ़ मुझ पर से नहीं गया। मुझे डर हुआ कि लोग मुझे मजनूँ कहेंगे और ज़बान दराज़ करके बुरा-भला कहेंगे।” हज़रत ख़दीजा इन हालात और इन दिनों का इंतिज़ार कर रही थीं और इसके लिए तैयार थीं। उन्होंने कहा: “अल्लाह तआला बचाए। हक़ तआला आपको भलाई ही अता करता है और भलाई के सिवा आपके लिए कुछ नहीं चाहता। अल्लाह तआला के हक़ की क़सम, मुझे यक़ीन है कि आप इस उम्मत के नबी होंगे, क्योंकि आप मेहमान को अज़ीज़ रखते हैं। आप सच बोलते हैं और अमानतदार हैं। बेबसों की मदद करते हैं, यतीमों की हिफ़ाज़त करते हैं, परदेसियों की मदद करते हैं। आपका मिज़ाज अच्छा है; इन ख़ूबियों वाले को कोई डर नहीं होता।”7

फिर वे इस हाल के बारे में पूछने के लिए वरक़ा इब्ने नौफ़ल के पास गए। रसूलुल्लाह की सुनाई हुई बातें सुनकर वरक़ा ने कहा: “ख़ुशख़बरी हो, ऐ मुहम्मद अलैहिस्सलाम! मैं अल्लाह तआला की क़सम खाता हूँ कि तुम वही आख़िरी नबी हो जिनकी ख़बर हज़रत ईसा ने दी थी। तुम्हें दिखाई देने वाले फ़रिश्ते वही जिबराईल अलैहिस्सलाम हैं जो तुमसे पहले मूसा अलैहिस्सलाम के पास आए थे। आह! काश मैं जवान होता! काश मैं वह ज़माना पाता जब लोग तुम्हें मक्का से निकालेंगे, और तुम्हारी मदद को दौड़ता! बहुत जल्द तुम्हें तबलीग़ और जिहाद का हुक्म दिया जाएगा।” और उन्होंने नबी-ए-करीम का मुबारक हाथ चूमा। कुछ ही दिनों बाद उनका इंतिक़ाल हो गया।8

तबलीग़ का हुक्म आना

वह पहली वह्य, जिसमें हमारे प्यारे नबी को आपकी नुबुव्वत की ख़बर दी गई, इस तरह आई थी। फिर वह रुक गई और तीन साल तक न आई। इस दौरान इसराफ़ील अलैहिस्सलाम नाम के फ़रिश्ते आकर आपको कुछ बातें सिखाते रहे। ये वह्य न थीं। इस अरसे में रसूलुल्लाह कभी-कभी बहुत बेचैन हो जाते थे। जब भी आप ग़मगीन होते, जिबराईल अलैहिस्सलाम ज़ाहिर होकर कहते: “ऐ हबीबुल्लाह! आप अल्लाह तआला के नबी हैं”, और आपकी परेशानी दूर कर देते। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “यह वह्य के रुक जाने का ज़माना था। मैं हिरा पहाड़ से नीचे उतर रहा था कि अचानक आसमान की तरफ़ से एक आवाज़ सुनी। मैंने ऊपर देखा तो जिबराईल (अलैहिस्सलाम) दिखाई दिए। वह ज़मीन और आसमान के बीच एक कुर्सी पर बैठे थे। मुझ पर ख़ौफ़ छा गया। मैं घर पहुँचा और कहा: ‘मुझे किसी चीज़ से ढाँप दो।’ तब हक़ तआला ने सूरह मुद्दस्सिर की वे पहली आयतें9 उतारीं जिनका मफ़हूम है: ’ऐ अपनी चादर में लिपटने वाले मुहम्मद अलैहिस्सलाम! उठो और (काफ़िरों को अल्लाह तआला के अज़ाब से) डराओ! अपने रब की बड़ाई बयान करो, उसकी ताज़ीम करो! अपने कपड़ों को पाक रखो!’ इसके बाद वह्य का सिलसिला नहीं टूटा।”

फ़ख़्र-ए-कायनात (अलैहि अफ़ज़लुस्सलवात) लोगों को इस्लाम की दावत देने और अल्लाह तआला के हुक्म और मनाहियाँ पहुँचाने लगे। जिबराईल अलैहिस्सलाम वह्य लाते वक़्त कभी इंसान की शक्ल में, सहाबा-ए-किराम में से दिहया कल्बी की सूरत में आते थे। कभी वह वह्य को नबी-ए-करीम के मुबारक दिल में डाल देते थे; उस वक़्त रसूलुल्लाह उन्हें नहीं देखते थे। कभी वह्य ख़्वाब के ज़रिए आती, और कभी एक ख़ौफ़नाक गूँज के साथ।

नबी-ए-करीम पर सबसे भारी और सबसे सख़्त वह्य यही होती थी। ऐसे वक़्तों में सबसे ठंडे दिन भी रसूलुल्लाह की मुबारक पेशानी से पसीना टपकता, और अगर आप ऊँट पर होते, तो वह्य के बोझ से ऊँट ज़मीन पर बैठ जाता। आपके पास मौजूद सहाबा भी वह्य का बोझ महसूस करते थे। जिबराईल अलैहिस्सलाम कई बार अपनी असली शक्ल-ओ-सूरत में भी आए।

“ऐ अपनी चादर में लिपटने वाले मुहम्मद! उठो और (काफ़िरों को अल्लाह तआला के अज़ाब से) डराओ! अपने रब की बड़ाई बयान करो, उसकी ताज़ीम करो!” मुद्दस्सिर: 1–3

अल्लाह तआला ने नबी-ए-करीम पर फ़रिश्ते और पर्दे के बग़ैर, यानी बिना किसी वास्ते के भी वह्य भेजी है। यह मेराज की रात में हुआ। पहली वह्य के आने से मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी शुरू हुई, और आपकी इस्लाम की तबलीग़ तेईस साल जारी रही। इस अरसे के तेरह साल मक्का में और दस साल मदीना में गुज़रे। क़ुरआन-ए-करीम 22 साल 2 महीने 22 दिन के अरसे में उतरकर पूरा हुआ।

मुहम्मद अलैहिस्सलाम उम्मी थे, यानी आपने न कोई किताब पढ़ी थी, न कुछ लिखा था और न किसी से सबक़ लिया था। आप मक्का में पैदा हुए और पले-बढ़े, कुछ गिने-चुने लोगों के बीच परवरिश पाई। इसके बावजूद आपने तौरात और इंजील में, यूनान और रूम के ज़मानों में लिखी गई किताबों में मौजूद मालूमात और वाक़िआत की ख़बर दी। इस्लाम की दावत पहुँचाने के लिए आपने हिजरत के छठे साल के आख़िर और सातवें साल की शुरुआत में रूम, ईरान और हब्शा के हुक्मरानों और दूसरे अरब बादशाहों को ख़त भेजे। आपकी ख़िदमत में साठ से ज़्यादा परदेसी सफ़ीर आए। यह बात क़ुरआन-ए-करीम में मफ़हूमन यूँ बताई गई है: “तुमने इस क़ुरआन-ए-करीम के आने से पहले कोई किताब नहीं पढ़ी, न कुछ लिखा। अगर तुम लिखना-पढ़ना जानते होते, तो वे कह सकते थे कि तुमने दूसरों से सीखा है।”10

हदीस शरीफ़ में भी फ़रमाया गया: “मैं उम्मी नबी मुहम्मद हूँ… मेरे बाद कोई नबी नहीं।”11 और क़ुरआन-ए-करीम में यूँ फ़रमाया गया है: “वह (मुहम्मद अलैहिस्सलाम) अपनी मर्ज़ी से नहीं बोलते। उनकी बातें उन्हें वह्य के ज़रिए बताई और सिखाई जाती हैं।”12

पहले मुसलमान (साबिक़ून-ए-इस्लाम)

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर पहली वह्य आने के बाद सबसे पहले ईमान लाने वाली हमारी माँ हज़रत ख़दीजा थीं।13 उन्होंने बिना किसी झिझक के फ़ौरन इस्लाम क़बूल किया और पहली मुसलमान होने का शरफ़ पाया।

नबी-ए-करीम ने हज़रत ख़दीजा को उसी तरह वुज़ू करना सिखाया जैसे जिबराईल अलैहिस्सलाम ने सिखाया था। फिर नबी-ए-करीम इमाम बने, और दोनों ने मिलकर दो रकअत नमाज़ अदा की। ख़दीजा ने हमारे प्यारे नबी की हर बात और हर हुक्म की सबसे कामिल तरीक़े से इताअत की। इस तरह उन्होंने अल्लाह तआला के यहाँ बहुत बुलंद दर्जे पाए। रसूलुल्लाह ग़मगीन होते, इनकार करने वालों के मज़ाक़ उड़ाने से तकलीफ़ उठाते, तो वह आपको तसल्ली देतीं और आपका ग़म दूर करतीं। वह कहती थीं: “या रसूलल्लाह! बिल्कुल ग़म न कीजिए, फ़िक्र न कीजिए। आख़िरकार हमारा दीन ताक़त पाएगा और मुशरिक हलाक होंगे। आपकी क़ौम आपकी इताअत करेगी…” ख़दीजा की इन मददों की वजह से एक दिन जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और कहा: “या रसूलल्लाह! ख़दीजा को अल्लाह तआला का सलाम पहुँचा दीजिए।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ ख़दीजा! यह जिबराईल (अलैहिस्सलाम) तुम्हें अल्लाह तआला का सलाम पहुँचा रहे हैं।”14

एक बार नबी-ए-करीम ने यह भी फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया कि मैं ख़दीजा को जन्नत में मोती के एक घर की ख़ुशख़बरी दूँ। वहाँ न बीमारी है, न ग़म, न सिरदर्द।”

हज़रत ख़दीजा के बाद बड़ों में सबसे पहले हज़रत अबू बकर मुसलमान हुए, जो रसूलुल्लाह के क़रीबी दोस्तों में से थे। हज़रत अबू बकर ने इससे बीस साल पहले एक ख़्वाब देखा था: “आसमान से पूरा चाँद उतरकर काबा मुअज़्ज़मा पर आया, टुकड़े-टुकड़े हो गया, हर टुकड़ा मक्का के घरों में से किसी एक घर पर गिरा, फिर ये टुकड़े आपस में मिलकर आसमान की तरफ़ बुलंद हो गए। लेकिन अबू बकर के घर पर गिरा हुआ टुकड़ा आसमान की तरफ़ नहीं उठा। यह देखकर हज़रत अबू बकर ने फ़ौरन घर का दरवाज़ा बंद कर लिया, गोया उन्होंने चाँद के इस टुकड़े को जाने से रोक लिया।”

अबू बकर ख़्वाब से घबराकर जाग उठे, और सुबह होते ही फ़ौरन यहूदी आलिमों में से एक के पास दौड़कर गए और अपना ख़्वाब सुनाया। उस आलिम ने जवाब में कहा: “यह परेशान ख़्वाबों में से एक है, इसलिए इसकी ताबीर नहीं की जाती।” लेकिन यह ख़्वाब अबू बकर के ज़ेहन को कुरेदता रहा, और यहूदी के जवाब से भी उन्हें तसल्ली न हुई। एक बार तिजारत के लिए जाते हुए उनका रास्ता बहीरा राहिब के इलाक़े से गुज़रा। जब उन्होंने बहीरा से अपने ख़्वाब की ताबीर पूछी, तो बहीरा ने पूछा: “तुम कहाँ के हो?” हज़रत अबू बकर ने जवाब दिया: “क़ुरैश से हूँ।” तो बहीरा ने कहा: “वहाँ एक नबी ज़ाहिर होंगे और हिदायत का नूर मक्का के हर कोने तक पहुँचेगा। तुम उनकी ज़िंदगी में उनके वज़ीर और उनके इंतिक़ाल के बाद उनके ख़लीफ़ा बनोगे।” हज़रत अबू बकर इस जवाब पर बहुत हैरान हुए। जब तक नबी-ए-करीम ने अपनी नुबुव्वत का एलान नहीं किया, हज़रत अबू बकर ने अपना यह ख़्वाब और इसकी ताबीरें किसी को नहीं बताईं। जब हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने अपनी नुबुव्वत का एलान किया, तो हज़रत अबू बकर फ़ौरन नबी-ए-करीम के पास दौड़कर आए और पूछा: “नबियों के पास अपनी नुबुव्वत की दलीलें होती हैं, आपकी दलील क्या है?” नबी-ए-करीम ने जवाब में फ़रमाया: “मेरी नुबुव्वत की दलील तुम्हारा वह ख़्वाब है जिसकी ताबीर तुमने एक यहूदी आलिम से पूछी थी। उस आलिम ने कहा: ‘यह परेशान ख़्वाबों में से है, इसकी ताबीर नहीं की जाती।’ फिर बहीरा राहिब ने इसकी सही ताबीर की।” और हज़रत अबू बकर से मुख़ातिब होकर फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! मैं तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ बुलाता हूँ।”

इस पर हज़रत अबू बकर यह कहकर मुसलमान हो गए: “मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के रसूल हैं, आपकी नुबुव्वत हक़ है, और यह जहान को रौशन करने वाला एक नूर है।”

एक दूसरी रिवायत के मुताबिक़, नबी-ए-करीम को नुबुव्वत मिलने से पहले ही हज़रत अबू बकर तिजारत के इरादे से यमन गए थे। इस सफ़र में यमन में उनकी मुलाक़ात अज़्द क़बीले के एक बूढ़े से हुई जिसने बहुत किताबें पढ़ी थीं। इस बूढ़े ने हज़रत अबू बकर को देखकर कहा: “मेरा ख़याल है कि तुम मक्का वालों में से हो।” हज़रत अबू बकर ने कहा: “हाँ, ऐसा ही है”, और उनके बीच यह बातचीत हुई:

– क्या तुम क़ुरैश से हो?

– हाँ!

– बनू तमीम से हो?

– हाँ!

– एक निशानी और बाक़ी है। – वह क्या?

– अपना पेट खोलो, मैं देखूँ।

– बताओ, इससे तुम्हारा मक़सद क्या है?

– मैंने किताबों में पढ़ा है कि मक्का में एक नबी आएँगे। दो आदमी उनके मददगार होंगे: एक जवान, दूसरा बूढ़ा। जवान बहुत-सी मुश्किलों को आसानी में बदल देगा, बहुत-सी मुसीबतें दूर करेगा। उस बूढ़े का रंग गोरा, कमर पतली होगी और उसके पेट पर एक काला तिल होगा। मेरा ख़याल है कि वह शख़्स तुम हो। अपना पेट खोलो, मैं देखूँ।

“वह (मुहम्मद अलैहिस्सलाम) अपनी मर्ज़ी से नहीं बोलते। उनकी बातें उन्हें वह्य के ज़रिए बताई और सिखाई जाती हैं” नज्म: 3–4

इस पर हज़रत अबू बकर ने अपना मुबारक पेट खोला; उनकी नाफ़ के ऊपर काला तिल देखकर बूढ़े ने कहा: “अल्लाह की क़सम, वह शख़्स तुम ही हो”, और अबू बकर को बहुत-सी वसीयतें कीं। हज़रत अबू बकर अपना काम पूरा करके रुख़सत होने के लिए बूढ़े के पास आए और उससे दरख़्वास्त की कि नबी-ए-करीम के बारे में कुछ शेर सुनाए। इस पर बूढ़े ने बारह शेर पढ़े, और हज़रत अबू बकर ने उन्हें याद कर लिया।

हज़रत अबू बकर जब सफ़र से मक्का मुकर्रमा लौटे, तो उक़बा इब्ने अबी मुऐत, शैबा, अबू जहल, अबुल बख़्तरी जैसे क़ुरैश के बड़े लोग उनसे मिलने उनके घर आए। हज़रत अबू बकर ने उनसे पूछा: “तुम्हारे बीच कोई नया वाक़िआ तो पेश नहीं आया?” उन्होंने जवाब में कहा: “इससे अजीब वाक़िआ और क्या होगा कि अबू तालिब का यतीम नुबुव्वत का दावा कर रहा है और कहता है कि तुम, तुम्हारे बाप और दादा बातिल दीन पर हो। अगर तुम्हारा लिहाज़ न होता, तो हम उसे अब तक ज़िंदा न छोड़ते। तुम उसके गहरे दोस्त हो, यह मामला तुम ही निपटाओ।”

हज़रत अबू बकर ने उन्हें टाल दिया और मालूम किया कि नबी-ए-करीम हज़रत ख़दीजा के घर में हैं। उन्होंने जाकर दरवाज़ा खटखटाया। नबी-ए-करीम ने उनका इस्तिक़बाल किया, तो अबू बकर ने पूछा: “ऐ मुहम्मद! आपके बारे में जो कहा जा रहा है, वह क्या है?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मैं हक़ तआला का नबी हूँ। मुझे तुम्हारी तरफ़ और आदम की सारी औलाद की तरफ़ भेजा गया है। ईमान लाओ, ताकि हक़ तआला की रज़ा पा लो और अपनी जान को जहन्नम से बचा लो।”

हज़रत अबू बकर ने कहा: “इसकी दलील क्या है?” तो रसूल-ए-अकरम ने फ़रमाया: “दलील उस बूढ़े का क़िस्सा है जिसे तुमने यमन में देखा।” हज़रत अबू बकर ने कहा: “मैंने यमन में बहुत-से बूढ़े और जवान देखे।” नबी-ए-करीम ने जवाब में फ़रमाया: “वह बूढ़ा जिसने तुम्हें बारह शेर अमानत के तौर पर दिए और मेरे पास भेजे”, और उन शेरों को पूरा पढ़ सुनाया। हज़रत अबू बकर ने कहा: “आपको यह किसने बताया?” तो नबी-ए-करीम ने जवाब दिया: “उस फ़रिश्ते ने बताया जो मुझसे पहले के नबियों के पास आता था।” आपके यह फ़रमाते ही हज़रत अबू बकर ने कहा: “अपना हाथ मुझे दीजिए”, फिर आपका मुबारक हाथ थाम लिया और यह कहकर मुसलमान हो गए: “अशहदु अल ला इलाह इल्लल्लाह, व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।”15 हज़रत अबू बकर मुसलमान होकर अपने घर लौटे; ऐसी बड़ी ख़ुशी उन्होंने ज़िंदगी में पहली बार महसूस की थी। एक हदीस शरीफ़ में भी यूँ फ़रमाया गया है: “मैंने जिसके सामने भी ईमान पेश किया, उसने मुँह बनाया और झिझकते हुए देखा। सिर्फ़ अबू बकर सिद्दीक़ ने ईमान क़बूल करने में ज़रा भी झिझक और देर नहीं की।”

एक दिन नबी-ए-करीम हज़रत ख़दीजा के साथ नमाज़ पढ़ रहे थे कि हज़रत अली ने उन्हें देख लिया। उस वक़्त वह दस या बारह साल के थे। नमाज़ के बाद उन्होंने पूछा: “यह क्या है?” रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “यह अल्लाह तआला का दीन है। मैं तुम्हें इस दीन की तरफ़ बुलाता हूँ। अल्लाह तआला एक है, उसका कोई शरीक नहीं। मैं तुम्हें उस अल्लाह पर ईमान लाने की दावत देता हूँ जो एक है, जिसका न कोई हमसर है, न शरीक…” हज़रत अली ने कहा: “पहले अपने वालिद से मशवरा कर लूँ।” रसूलुल्लाह ने उनसे फ़रमाया: “अगर इस्लाम में न आओ, तो यह राज़ किसी को न बताना!” अगली सुबह हज़रत अली रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और यह कहकर मुसलमान हो गए: “या रसूलल्लाह! मुझे इस्लाम सिखाइए।”16

हज़रत अली मुसलमान होने वालों में तीसरे थे। रसूल-ए-अकरम की राह में उनकी क़ुरबानी और आपको अपने आप पर तरजीह देना तो हर तारीफ़ से बढ़कर है।

ज़ैद इब्ने हारिसा पहले ईमान लाने वालों में से हैं। उन्होंने हज़रत ख़दीजा, हज़रत अबू बकर और हज़रत अली के बाद चौथे, और आज़ाद किए गए ग़ुलामों में पहले मुसलमान होने का शरफ़ पाया। उनके साथ उनकी बीवी उम्मे ऐमन भी मुसलमान हुईं।17

हज़रत अबू बकर मुसलमान होते ही फ़ौरन अपने बहुत प्यारे दोस्तों के पास गए। उन्होंने उन्हें भी मुसलमान होने के लिए राज़ी कर लिया। सहाबा-ए-किराम के बड़ों में से उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान, तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह, ज़ुबैर इब्ने अव्वाम, अब्दुर रहमान इब्ने औफ़, साद इब्ने अबी वक़्क़ास जैसी अपनी क़ौम की बड़ी, बुलंद शख़्सियतें इनमें सबसे नुमायाँ हैं।18 हज़रत ख़दीजा के बाद मुसलमान होने वाले इन आठ लोगों को साबिक़ून-ए-इस्लाम, यानी पहले मुसलमान कहा जाता है। हज़रत उस्मान अपने मुसलमान होने का हाल यूँ बयान करते हैं: “मेरी एक ख़ाला काहिन थीं। एक दिन मैं उनसे मिलने गया। उन्होंने मुझसे कहा: ‘तुम्हें एक बीवी नसीब होगी। लेकिन न तुमने उससे पहले किसी औरत को देखा होगा, न उसने तुमसे पहले किसी मर्द को देखा होगा। वह ख़ूबसूरत चेहरे वाली, ज़ाहिदा ख़ातून और एक बड़े नबी की बेटी होगी।’

मैं अपनी ख़ाला की इस बात पर हैरान हुआ। उन्होंने मुझसे फिर कहा: ‘एक नबी आ गए हैं। उन पर आसमान से वह्य उतरी है।’ मैंने कहा: ‘ऐ मेरी ख़ाला! ऐसी कोई ख़बर तो शहर में बिल्कुल सुनाई नहीं दी। यह बात साफ़-साफ़ बताइए।’ तब मेरी ख़ाला ने कहा: ‘मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह को नुबुव्वत मिली है। वह लोगों को दीन की दावत देते हैं। थोड़े ही अरसे में आलम उनके दीन से रौशन हो जाएगा, और मुख़ालफ़त करने वालों के सिर काटे जाएँगे।’

मेरी ख़ाला की इन बातों ने मुझ पर बहुत असर किया। मैं फ़िक्र में पड़ गया। हज़रत अबू बकर और मेरे बीच गहरी दोस्ती थी; हम एक-दूसरे से कभी जुदा न होते थे। इस मामले पर बात करने के लिए दो दिन बाद मैं हज़रत अबू बकर के पास गया। जब मैंने अपनी ख़ाला की कही बातें बताईं, तो उन्होंने मुझसे कहा: ‘ऐ उस्मान! तुम अक़्लमंद आदमी हो। कुछ पत्थर, जो न देखते हैं, न सुनते हैं, न किसी को नफ़ा पहुँचा सकते हैं न नुक़सान, माबूद होने के लायक़ कैसे हो सकते हैं?’ मैंने कहा: ‘आप सच कहते हैं, मेरी ख़ाला की बात सच है।’”

हज़रत उस्मान को इस्लाम समझाने के बाद हज़रत अबू बकर उन्हें रसूलुस सक़लैन, यानी इंसानों और जिन्नों के नबी, हमारे आक़ा की ख़िदमत में ले गए। हमारे प्यारे नबी ने हज़रत उस्मान से फ़रमाया: “ऐ उस्मान! हक़ तआला तुम्हें जन्नत में मेहमानी की दावत देता है। तुम भी यह दावत क़बूल करो। मुझे सारे इंसानों के लिए हिदायत का रहनुमा बनाकर भेजा गया है।” रसूलुल्लाह के बुलंद हाल और आपकी उन बातों के सामने, जो आपने मुस्कुराते चेहरे से फ़रमाईं, हज़रत उस्मान अपने आप से बेख़बर हो गए और बड़े शौक़ और पूरी सुपुर्दगी के साथ यह कहकर मुसलमान हो गए: “अशहदु अल ला इलाह इल्लल्लाह, व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।”

रसूलुल्लाह ने अपनी नुबुव्वत के पहले तीन सालों में लोगों को छिपकर इस्लाम की दावत दी। लोग आहिस्ता-आहिस्ता, एक-एक, दो-दो करके मुसलमान होते जा रहे थे। इस अरसे में मुसलमानों की तादाद सिर्फ़ तीस तक पहुँची। वे भी अपनी इबादतें अपने घरों में करते थे और क़ुरआन-ए-करीम की उतरी हुई मुक़द्दस आयतों को छिपकर पढ़ते और याद करते थे।

“साबिक़ून-ए-इस्लाम, यानी पहले मुसलमान: अबू बकर सिद्दीक़, अली इब्ने अबी तालिब, ज़ैद इब्ने हारिसा, उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान, अब्दुर रहमान इब्ने औफ़, साद इब्ने अबी वक़्क़ास, ज़ुबैर इब्ने अव्वाम और तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह” (रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन)

क़रीबी रिश्तेदारों को दावत

सूरह मुद्दस्सिर उतरने पर रसूलुल्लाह ने लोगों को दीन-ए-इस्लाम की दावत देना शुरू कर दिया था। यह दावत आप छिपकर देते थे। कुछ अरसे बाद वह आयत-ए-करीमा उतरी जिसका मफ़हूम है: “अपने क़रीबी रिश्तेदारों को अल्लाह तआला के अज़ाब से डराकर उन्हें हक़ दीन की तरफ़ बुलाओ।”19 इस पर हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने अपने रिश्तेदारों को दीन की दावत देने के लिए हज़रत अली को भेजा और उन सबको अबू तालिब के घर बुलाया। उनके सामने एक आदमी के लायक़ खाने की एक थाली और दूध का एक प्याला रखा। पहले ख़ुद बिस्मिल्लाह पढ़कर खाना शुरू किया, फिर आए हुए रिश्तेदारों से फ़रमाया: “लीजिए, खाइए!” आने वाले चालीस लोग थे। लेकिन रखे हुए खाने से सबने पेट भरकर खाया और वह ज़रा भी कम न हुआ। आने वाले इस मोजिज़े के सामने हैरान रह गए। खाने के बाद नबी-ए-करीम अपने रिश्तेदारों को इस्लाम की दावत देने के लिए बात शुरू करने ही वाले थे कि आपके चचा अबू लहब ने दुश्मनी से कहा: “हमने आज जैसा जादू कभी नहीं देखा। तुम्हारे रिश्तेदार ने तुम पर जादू कर दिया है। ऐ मेरे भाई के बेटे! तुम जैसा शर और बुराई लाने वाला कोई और शख़्स मैंने नहीं देखा”, और इसी तरह तौहीन भरी बातें करता रहा।

नबी-ए-करीम ने अबू लहब से फ़रमाया: “जो बुराई क़ुरैश और सारे अरब क़बीले भी न कर सकें, वह बुराई तुमने मेरे साथ की!” उनमें से कोई भी मुसलमान न हुआ और सब बिखर गए। इस वाक़िए के कुछ ही दिनों बाद आपने अपने रिश्तेदारों को फिर बुलाया। हज़रत अली फिर उन सबको बुलाकर लाए।

पहले की तरह उनके सामने खाना रखा गया। खाने के बाद नबी-ए-करीम खड़े हुए और फ़रमाया: “हम्द सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए ख़ास है। मदद मैं सिर्फ़ उसी से माँगता हूँ। उसी पर ईमान रखता हूँ, उसी पर भरोसा करता हूँ। मैं यक़ीन से जानता हूँ और बताता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा कोई माबूद नहीं, वह एक है। उसका न कोई हमसर है, न शरीक।” फिर आपने अपनी बात यूँ जारी रखी: “मैं तुमसे कभी झूठ नहीं बोलता, मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ… मैं तुम्हें उस अल्लाह तआला पर ईमान लाने की दावत देता हूँ जो एक है और जिसके सिवा कोई माबूद नहीं। मैं उसका वह नबी हूँ जिसे उसने तुम्हारी तरफ़ और सारे इंसानों की तरफ़ भेजा है। अल्लाह की क़सम, तुम उसी तरह मरोगे जैसे नींद में चले जाते हो, और उसी तरह ज़िंदा किए जाओगे जैसे नींद से जागते हो, और अपने सारे कामों का हिसाब दोगे; अपनी नेकियों का बदला इनाम और अपनी बुराइयों का बदला सज़ा पाओगे। और वह है जन्नत में हमेशा रहना या जहन्नम में हमेशा रहना। लोगों में से सबसे पहले जिन्हें मैं आख़िरत के अज़ाब से डरा रहा हूँ, वे तुम हो।”

ये बातें सुनकर अबू तालिब ने कहा: “ऐ मेरे मोहतरम भतीजे! तुम्हारी मदद करने से ज़्यादा क़ीमती कोई चीज़ मैं नहीं जानता। तुम्हारी नसीहतें हमने दिल से अपना लीं, तुम्हारी बातों की भी दिल से तस्दीक़ की। इस वक़्त यहाँ जो लोग जमा हैं, वे तुम्हारे दादा अब्दुल मुत्तलिब की औलाद हैं। बेशक मैं भी उन्हीं में से एक हूँ। तुम जो चाहते हो, उसकी तरफ़ हममें सबसे पहले मैं दौड़ूँगा। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें घेरे में लेकर तुम्हारी हिफ़ाज़त करने से एक पल के लिए भी पीछे नहीं हटूँगा। जिस काम का तुम्हें हुक्म दिया गया है, उसे जारी रखो। लेकिन अपने पुराने दीन से जुदा होने के मामले में मैंने अपने नफ़्स को अपना फ़रमाँबरदार नहीं पाया।”

अबू लहब के सिवा वहाँ मौजूद रिश्तेदारों और चचाओं ने नर्मी से बात की। लेकिन अबू लहब ने ये गुस्ताख़ाना बातें कहीं और धमकियाँ दीं: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटो! इससे पहले कि दूसरे इसका हाथ पकड़कर इसे रोकें, तुम ख़ुद इसे रोक लो। अगर आज तुमने इसकी बातें मान लीं, तो ज़िल्लत और रुसवाई उठाओगे। अगर इसकी हिमायत पर उतरे, तो तुम सब मारे जाओगे…” अबू लहब के जवाब में नबी-ए-करीम की फूफी ने कहा: “ऐ मेरे भाई! अपने भाई के बेटे और इनके दीन को बेसहारा छोड़ देना क्या तुम्हें ज़ेब देता है? अल्लाह की क़सम, आज के ज़िंदा आलिम बताते हैं कि अब्दुल मुत्तलिब की नस्ल से एक नबी आने वाले हैं। वह नबी यही हैं।”

इन बातों के जवाब में भी अबू लहब अपनी बेहूदा बातें करता रहा। अबू तालिब ने ग़ुस्से में अबू लहब से कहा: “ऐ बुज़दिल! अल्लाह की क़सम, जब तक हम ज़िंदा हैं, हम इनके मददगार और हिमायती हैं।” फिर मुहम्मद अलैहिस्सलाम की तरफ़ मुड़कर कहा: “ऐ मेरे भाई के बेटे! जब तुम लोगों को अपने रब पर ईमान की दावत देना चाहो, तो हमें वक़्त बता देना; हम हथियार बाँधकर तुम्हारे साथ निकलेंगे।” इसके बाद फ़ख़्र-ए-कायनात ने फिर बात शुरू की और फ़रमाया: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटो! अल्लाह की क़सम, अरबों में कोई ऐसा शख़्स नहीं जो अपनी क़ौम के पास उस चीज़ से बेहतर और ज़्यादा भलाई वाली चीज़ लाया हो जो मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ, जो तुम्हारी दुनिया और आख़िरत दोनों के लिए भलाई है (यानी यह दीन)। मैं तुम्हें ऐसे दो कलिमे कहने की दावत देता हूँ जो ज़बान पर हल्के और मीज़ान में भारी हैं। वह यह है कि तुम गवाही दो कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मैं उसका बंदा और उसका रसूल हूँ। अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया है कि मैं तुम्हें इसकी दावत दूँ। तो तुममें से कौन मेरी यह दावत क़बूल करेगा और इस राह में मेरा मददगार बनेगा?” किसी की आवाज़ न निकली। सबने अपने सिर झुका लिए। नबी-ए-करीम ने अपनी ये बातें तीन बार दोहराईं। हर बार हज़रत अली उठकर खड़े हो जाते थे। तीसरी बार उन्होंने कहा: “या रसूलल्लाह! अगरचे उम्र में मैं इन सबसे छोटा हूँ, फिर भी आपका मददगार मैं बनूँगा।” इस पर रसूलुल्लाह ने हज़रत अली का हाथ थाम लिया।

बाक़ी लोग हैरान होकर बिखर गए। अल्लाह तआला के हबीब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने रिश्तेदारों के इस रवैये पर बहुत ग़मगीन हुए।

लेकिन आप हिम्मत हारे बिना उन्हें दावत देते रहे, ताकि वे जहन्नम से नजात और सआदत पा सकें।

बेसत के चौथे साल सूरह हिज्र की 94वीं आयत-ए-करीमा उतरी। जब यह इलाही हुक्म आया, जिसका मफ़हूम है: “(ऐ मेरे हबीब!) तुम्हें जिस चीज़ का हुक्म दिया गया है (हुक्मों और मनाहियों का), उसे खोलकर बयान करो। मुशरिकों से मुँह फेर लो! उनकी बातों की परवाह न करो!” तो हमारे प्यारे नबी मक्का वालों को खुल्लम-खुल्ला इस्लाम की दावत देने लगे। एक दिन आप सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े और फ़रमाया: “ऐ क़ुरैश के लोगो! यहाँ जमा होकर मेरी बात सुनो!” क़बीले जमा हो गए तो आपने पूछा: “ऐ मेरी क़ौम! क्या तुमने कभी मुझसे कोई झूठी बात सुनी है?” सबने एक साथ कहा: “नहीं, कभी नहीं सुनी।” आपने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने मुझे नुबुव्वत अता फ़रमाई है और मुझे तुम्हारी तरफ़ नबी बनाकर भेजा है।” फिर आपने सूरह आराफ़ की 158वीं आयत पढ़ी, जिसका मफ़हूम है: “(ऐ मेरे हबीब!) उनसे कह दो: ‘ऐ लोगो! मैं तुम सबकी तरफ़ आया हुआ, ज़मीनों और आसमानों के मालिक अल्लाह तआला का रसूल हूँ। हर जानदार को मारने वाला भी वही है और ज़िंदा करने वाला भी वही। उसके सिवा (इबादत के लायक़) कोई माबूद नहीं।’” सुनने वालों में से आपका चचा अबू लहब ग़ुस्से में, कुफ़्र पर अड़ते हुए चिल्लाया: “मेरे भाई का बेटा दीवाना हो गया है! जो हमारे बुतों को नहीं पूजता, जो हमारे दीन से अलग हो गया, उसकी बात मत सुनो!” वहाँ मौजूद लोग बिखर गए और कोई भी ईमान न लाया। यह जानते हुए भी कि नबी-ए-करीम सच्चे और बुलंद अख़लाक़ वाले हैं, उन्होंने आपसे मुँह फेर लिया और आपके दुश्मन बन गए।

“अपने क़रीबी रिश्तेदारों को अल्लाह के अज़ाब से डराकर उन्हें हक़ दीन की तरफ़ बुलाओ” शुअरा: 214

फिर एक दिन अल्लाह तआला के इस हुक्म: “तुम्हें जिस चीज़ का हुक्म दिया गया है (हुक्मों और मनाहियों का), उसे खोलकर बयान करो” की तामील में नबी-ए-करीम फिर सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े। ऊँची और गरजदार आवाज़ में आपने लोगों को पुकारा: “या सबाहाह! यहाँ आओ, जमा हो जाओ, मेरे पास तुम्हारे लिए एक अहम ख़बर है!”20 इस पुकार पर क़बीले दौड़ते हुए जमा हो गए। वे हैरत और तजस्सुस के साथ इंतिज़ार करने लगे। जो न आ सके, उन्होंने यह जानने के लिए अपने आदमी भेजे कि लोग क्यों जमा किए गए हैं। आने वालों में से एक गिरोह पूछने लगा: “ऐ मुहम्मदुल अमीन! तुमने हमें यहाँ क्यों जमा किया, क्या ख़बर देना चाहते हो?” आपने “ऐ क़ुरैश के क़बीलो!” कहकर अपनी बात शुरू की। हर कोई बड़े ध्यान से सुन रहा था। आपने अपनी बात जारी रखी: “मेरी और तुम्हारी मिसाल उस शख़्स जैसी है जो दुश्मन को देखकर अपने घर वालों को ख़बर देने के लिए दौड़ा, और इस डर से कि दुश्मन उससे पहले उसके घर वालों तक पहुँचकर नुक़सान न पहुँचा दे, चिल्लाया: ‘या सबाहाह!’ (दुश्मन ने हमें घेर लिया! सुबह आ पहुँची! जल्दी लड़ाई के लिए तैयार हो जाओ!) ऐ क़ुरैश के लोगो! अगर मैं तुमसे कहूँ कि इस पहाड़ के पीछे दुश्मन का एक लश्कर है, जो तुम पर हमला करने वाला है, तो क्या तुम मेरी बात मानोगे?” उन्होंने कहा: “हाँ, मानेंगे, क्योंकि आज तक हमने तुममें सच्चाई के सिवा कुछ नहीं देखा। हमने तुम्हें कभी झूठ बोलते नहीं देखा!…”

इस पर आपने क़ुरैश के सारे क़बीलों के नाम गिनाते हुए फ़रमाया: “ऐ बनू हाशिम! ऐ बनू अब्दे मनाफ़! ऐ बनू अब्दुल मुत्तलिब!” और फिर यूँ जारी रखा: “मैं तुम्हें उस सख़्त अज़ाब से ख़बरदार करने वाला हूँ जिसका आना यक़ीनी है। अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया है कि मैं अपने सबसे क़रीबी रिश्तेदारों को आख़िरत के अज़ाब से डराऊँ। मैं तुम्हें यह कहकर ईमान लाने की दावत देता हूँ: ला इलाह इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीका लहू (अल्लाह एक है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं)। और मैं उसका बंदा और उसका रसूल हूँ। अगर तुम इस पर ईमान लाओगे, तो जन्नत में जाओगे। जब तक तुम “ला इलाह इल्लल्लाह” नहीं कहोगे, मैं तुम्हें न दुनिया में कोई फ़ायदा पहुँचा सकता हूँ, न आख़िरत में कोई हिस्सा दिला सकता हूँ।” सुनने वाले क़बीलों में से अबू लहब ने कहा: “क्या तुमने हमें इसी लिए जमा किया था?” और ज़मीन से एक पत्थर उठाकर हमारे प्यारे नबी की तरफ़ फेंका। दूसरों की तरफ़ से ऐसी कोई मुख़ालफ़त नहीं हुई; वे आपस में बातें करते हुए बिखर गए।21

अगर सूरज को मेरे दाहिने हाथ में रख दें तब भी!

इन दावतों के बाद हमारे प्यारे नबी जहाँ भी किसी शख़्स या किसी गिरोह को देखते, उन्हें इस्लाम समझाते। आपने बताया कि असली नजात नफ़्स की पैरवी, ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और हर तरह के बुरे कामों से दूर रहने और अल्लाह तआला पर ईमान लाने से ही मुमकिन है। अपने नफ़्स की ख़्वाहिशों और शहवतों के पीछे चलने वाले, कमज़ोरों को कुचलने वाले और सरकशी में हद से गुज़र जाने वाले इसके सख़्त ख़िलाफ़ खड़े हो गए। यह देखकर कि उनके इन तमाम बिगड़े हुए कामों का ख़ात्मा कर दिया जाएगा, उन्होंने मुहम्मद अलैहिस्सलाम की बताई हुई बातों का इनकार कर दिया। वे आपके और ईमान लाने वालों के दुश्मन बन गए। मुशरिक पहले मज़ाक़ उड़ाते थे। फिर उन्होंने दबाव और ज़ुल्म-ओ-सितम बढ़ाने का फ़ैसला किया। वे मोमिनों को डराकर दबा देना और इस्लाम की दावत को बुझा देना चाहते थे। इनके सरग़नों में अबू जहल, उत्बा, शैबा, अबू लहब, उक़बा इब्ने अबी मुऐत, आस इब्ने वाइल, असवद इब्ने मुत्तलिब, असवद इब्ने अब्दे यग़ूस, वलीद इब्ने मुग़ीरा… थे।

एक दिन उत्बा, शैबा और अबू जहल ने अबू तालिब से कहा: “तुम हमारे बुज़ुर्ग हो। हम हमेशा तुम्हारा लिहाज़ करते हैं, तुम्हारी इज़्ज़त करते हैं। अब तुम्हारे भाई के बेटे ने एक नया दीन गढ़ लिया है। वह हमारे बुतों को गालियाँ देता है और हमें काफ़िर ठहराता है। उसे नसीहत करो। उसे इस काम से बाज़ रखो। अगर वह बाज़ न आया, तो उससे कैसे निपटना है, यह हम जानते हैं…”

अबू तालिब ने उन्हें ठंडा करके वापस भेज दिया और हमारे नबी को इस बारे में कुछ नहीं बताया, ताकि आप दुखी न हों। कुछ समय बाद मुशरिक फिर इकट्ठा होकर अबू तालिब के पास आए। उन्होंने कहा: “इससे पहले भी हम तुम्हारे पास आकर हालात बता चुके थे। तुमने हमारी बात पर ध्यान नहीं दिया। वह अब भी हमारे बुतों की बुराई किए जा रहा है। अब हममें बर्दाश्त की ताक़त नहीं रही। हम तुम दोनों से अपने ख़ून के आख़िरी क़तरे तक लड़ेंगे। मक्का में या तो वह मिटेगा या हम मिटेंगे।” अबू तालिब ने उन्हें ठंडा करने की कोशिश की, लेकिन वे अपनी ज़िद पर अड़े रहे।22

अबू तालिब जिस तरह यह नहीं चाहते थे कि रसूलुल्लाह का दिल टूटे, उसी तरह यह भी नहीं चाहते थे कि क़ौम के साथ कोई दुश्मनी पैदा हो। वह हमारे नबी के पास आए और कहा: “ऐ मुहम्मद! सारी क़ौम तुम्हारी दुश्मनी में एक हो गई है और मुझसे शिकायत करने आई है। रिश्तेदारों के बीच दुश्मनी अच्छी बात नहीं। वे चाहते हैं कि तुम उन्हें काफ़िर न कहो और यह कहकर उनकी बुराई न करो कि वे बिगड़े हुए रास्ते पर हैं।” इस पर हबीब-ए-अकरम ने फ़रमाया:

“ऐ चचा! जान लीजिए कि अगर वे सूरज मेरे दाहिने हाथ में और चाँद मेरे बाएँ हाथ में रख दें (चाहे जो भी वादा करें), तब भी मैं इस दीन से और इसे लोगों तक पहुँचाने और बताने से हरगिज़ पीछे नहीं हटूँगा। या तो अल्लाह तआला इस दीन को सारे जहान में फैला देगा और मेरा फ़र्ज़ पूरा हो जाएगा, या मैं इस राह में अपनी जान क़ुरबान कर दूँगा।” फिर आप उठ खड़े हुए। आपकी मुबारक आँखें आँसुओं से भर आई थीं।

रसूलुल्लाह को दुखी देखकर अबू तालिब अपनी कही हुई बातों पर पछताए और आपके गले से लिपटकर कहा: “ऐ मेरे भतीजे! अपने रास्ते पर चलते रहो, जो चाहो करो। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम्हारी हिमायत करूँगा और तुम्हारी हिफ़ाज़त करूँगा।”23

मुशरिकों के सरदारों में से दस आदमियों ने जब यह समझ लिया कि अबू तालिब हज़रत मुहम्मद की हिमायत कर रहे हैं, तो वे उमारा इब्ने वलीद को भी साथ लेकर अबू तालिब के पास गए। उन्होंने उनके सामने एक ऐसी पेशकश रखी जिसे क़बूल करना मुमकिन ही न था: “ऐ अबू तालिब! तुम जानते हो कि यह उमारा मक्का के जवानों में सबसे ख़ूबसूरत, सबसे ताक़तवर और सबसे अच्छे अख़लाक़ वाला है। इसके अलावा यह शायर भी है। इसे हम तुम्हें दे देते हैं, अपने कामों में इससे काम लो। उमारा के बदले हमें मुहम्मद दे दो, ताकि हम उसे क़त्ल कर दें। तुम्हें आदमी के बदले आदमी मिल गया! और क्या चाहिए?” अबू तालिब इस बात पर बेहद ग़ुस्सा हुए। उन्होंने कहा: “पहले तुम अपने बेटे मुझे दो, मैं उन्हें क़त्ल करूँ। उसके बाद मैं अपना भतीजा दूँगा।” तब मुशरिकों ने मामले की संगीनी समझी और कहा: “हमारे बच्चे वह तो नहीं करते जो वह करता है…” अबू तालिब ने कहा: “मैं क़सम खाता हूँ, मेरा भतीजा तुम्हारे सब बच्चों से बेहतर है। यानी तुम अपना बेटा मुझे पालने के लिए दोगे और मेरे जिगर के टुकड़े को ले जाकर क़त्ल करोगे, यही न!… ऊँटनी भी अपने बच्चे के सिवा किसी के लिए न तड़पती है, न किसी पर तरस खाती है। यह बात अक़्ल और समझ से बहुत दूर है। अब तो मामला हद से गुज़र गया है। जो कोई मेरे जिगर के टुकड़े मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) का दुश्मन है, मैं भी उसका दुश्मन हूँ। इसे अच्छी तरह जान लो और तुमसे जो हो सके, कर लो!”24 मुशरिक ग़ुस्से में अपनी जगहों से उठकर चले गए। अबू तालिब ने फ़ौरन बनू हाशिम और बनू अब्दुल मुत्तलिब को इकट्ठा किया। उन्हें हालात बताकर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मदद करने पर राज़ी कर लिया। जो बाज़ू भी रसूलुल्लाह को क़त्ल करने के लिए उठता, उसे तोड़ दिया जाता। इस मामले में वे सब मुशरिकों के ख़िलाफ़ एक हो गए। सिर्फ़ अबू लहब शामिल नहीं हुआ। अबू तालिब ने उनसे कहा: “ऐ बहादुरो! कल तुममें से हर एक अपनी तलवार कमर में बाँधकर मेरे पीछे आए!”

“ऐ चचा! जान लीजिए कि अगर वे सूरज मेरे दाहिने हाथ में और चाँद मेरे बाएँ हाथ में रख दें (चाहे जो भी वादा करें), तब भी मैं इस दीन से और इसे लोगों तक पहुँचाने और बताने से हरगिज़ पीछे नहीं हटूँगा। या तो अल्लाह तआला इस दीन को सारे जहान में फैला देगा और मेरा फ़र्ज़ पूरा हो जाएगा, या मैं इस राह में अपनी जान क़ुरबान कर दूँगा” हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम

अगले दिन अबू तालिब नबी-ए-करीम के घर गए, और सब मिलकर हरम शरीफ़ की तरफ़ चल पड़े। बनू हाशिम के बहादुर जवान उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। वे काबा पहुँचकर मुशरिकों के सामने जा खड़े हुए। अबू तालिब ने मुशरिकों से कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! मैंने सुना है कि तुमने मेरे भतीजे को क़त्ल करने का फ़ैसला कर लिया है। क्या तुम जानते हो कि मेरे पीछे खड़े इन जवानों के हाथ उनकी तलवारों पर हैं और वे बड़ी बेसब्री से मेरे एक इशारे का इंतिज़ार कर रहे हैं? मैं क़सम खाता हूँ, अगर तुमने मुहम्मद को क़त्ल किया, तो तुममें से किसी को ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा!…” यह कहकर वह हमारे प्यारे नबी की तारीफ़ में शेर पढ़ने लगे। अबू जहल समेत वहाँ मौजूद सारे मुशरिक तितर-बितर हो गए।