हब्शा की तरफ़ हिजरत
हब्शा की तरफ़ पहली हिजरत
रसूलुल्लाह की नुबुव्वत (बेसत) के पाँचवें साल, मुशरिकों के ज़ुल्मों के बावजूद मुसलमानों की तादाद बढ़ती जा रही थी। लेकिन मुशरिक भी अपने ज़ुल्म बढ़ा रहे थे और कोई कसर उठा न रखते थे। नबी-ए-करीम को इस बात का बहुत दुख था कि आपके सहाबा नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त अज़ियतों में डाले जा रहे हैं, उनके पैर रस्सियों से ऊँटों के साथ बाँधकर उन्हें उलटी सम्तों में खिंचवाया जाता है और उनके टुकड़े कर दिए जाते हैं। ये अज़ियतें दिन-ब-दिन सख़्त होती जा रही थीं, और आपका रहमत से भरा दिल इन्हें बर्दाश्त न कर पाता था।
एक दिन आपने सहाबा-ए-किराम को इकट्ठा किया और फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! अब ज़मीन में फैल जाओ। अल्लाह तआला बहुत जल्द तुम्हें फिर एक जगह इकट्ठा कर देगा।”
उन्होंने पूछा: “या रसूलल्लाह! हम कहाँ जाएँ?” हमारे नबी ने अपने मुबारक हाथ से इशारा करके हब्शा (एबीसीनिया) के मुल्क की तरफ़ दिखाया और फ़रमाया: “वहाँ! हब्शा की सरज़मीन पर चले जाओ!1 क्योंकि वहाँ एक ऐसा बादशाह है जो अपने पास रहने वालों में से किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। और वह सच्चाई का मुल्क है। जब तक अल्लाह तआला तुम्हारी इन मुश्किलों से निकलने और छुटकारा पाने का कोई रास्ता न खोल दे, तुम वहीं रहो।”
इस तरह सरवर-ए-आलम मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़ैसला कर लिया था कि आपके सहाबा अज़ियतों से छुटकारा पाएँ और मक्का के मुशरिकों के ख़िलाफ़ अपनी जद्दोजहद आप अकेले जारी रखें। हमारे प्यारे नबी, जिन्होंने पैदाइश के वक़्त “मेरी उम्मत! मेरी उम्मत!” फ़रमाया था, अब भी अपने सहाबा की नजात के लिए ख़ुद को क़ुरबान कर रहे थे। आपकी इस इजाज़त पर सहाबा-ए-किराम में से कुछ अपना वतन छोड़कर हिजरत कर रहे थे!… लेकिन हमारे प्यारे नबी से जुदा होने की वजह से उनका ग़म भी बहुत बड़ा था।
इस पहली हिजरत में हज़रत उस्मान और उनकी बीवी हज़रत रुक़य्या बिन्ते रसूलुल्लाह, अबू हुज़ैफ़ा और उनकी बीवी सहला बिन्ते सुहैल, ज़ुबैर इब्ने अव्वाम, मुसअब इब्ने उमैर, अब्दुर रहमान इब्ने औफ़, अबू सलमा इब्ने अब्दुल असद और उनकी बीवी उम्मे सलमा, हातिब इब्ने अम्र, आमिर इब्ने रबीआ और उनकी बीवी लैला बिन्ते अबी हस्मा, उस्मान इब्ने मज़ऊन, अबू सबरा इब्ने अबी रुह्म और उनकी बीवी उम्मे कुलसूम बिन्ते सुहैल, सुहैल इब्ने बैज़ा और अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हुम) शामिल हुए।2 नबी-ए-करीम ने हज़रत उस्मान के बारे में फ़रमाया: “बेशक उस्मान लूत नबी के बाद अपनी बीवी के साथ हिजरत करने वाले पहले शख़्स हैं।”
सहाबा-ए-किराम में से कुछ सवारियों पर और कुछ पैदल, छिपकर मक्का से निकल गए। जब क़ाफ़िला शुऐबा पहुँचा, तो अल्लाह तआला के फ़ज़्ल से वहाँ दो तिजारती जहाज़ आए हुए थे। सहाबा ताजिरों को आधा-आधा सोने का सिक्का किराया देकर जहाज़ों में सवार हो गए। उसी दौरान यह ख़बर पाकर मुशरिक सहाबा के पीछे दौड़े। जब वे समुंदर के किनारे पहुँचे, तो मुहाजिर जहाज़ों में सवार होकर समुंदर में निकल चुके थे, इसलिए वे उनमें से किसी को न पकड़ सके। उनकी कोशिश बेकार गई और वे मायूस होकर लौट गए। सहाबा लाल सागर से होकर ख़ैरियत के साथ हब्शा पहुँच गए।3 हब्शा के बादशाह नज्जाशी ने मुसलमानों को अपने मुल्क में बसाया और उनके साथ बहुत अच्छा सुलूक किया।
“ऐ मेरे सहाबा! अब ज़मीन में फैल जाओ। अल्लाह तआला बहुत जल्द तुम्हें फिर एक जगह इकट्ठा कर देगा” हदीस शरीफ़
सहाबा के हब्शा चले जाने के बाद सूरह नज्म नाज़िल हुई। रसूलुल्लाह मस्जिद-ए-हराम में क़ुरैश के सामने यह सूरह पढ़ रहे थे; जब आप 19वीं और 20वीं आयत-ए-करीमा पर पहुँचे, जहाँ मुशरिकों के बुतों का ज़िक्र है, तो लानती शैतान ने “बुत बड़े बुत हैं, उनसे शफ़ाअत की उम्मीद की जाती है” जैसी बातें बीच में घुसा दीं। मुशरिकों ने समझा कि ये बातें रसूलुल्लाह ने कही हैं, और कहने लगे: “जब उसने हमारे दीन से मुवाफ़क़त कर ली, तो हमने भी उससे सुलह कर ली।” उसी दौरान वलीद इब्ने मुग़ीरा भी रसूलुल्लाह के पास आया और कहा: “इसके बाद हम तुम्हें हाथ नहीं लगाएँगे”, तो नबी-ए-करीम हैरान हुए। मुशरिकों की इस “सुलह” (!) की ख़बर रमज़ान शरीफ़ के आख़िरी दिनों में हब्शा में मौजूद सहाबा तक पहुँची। हब्शा के मुसलमानों को ख़बर मिली: “मक्का में मुशरिकों और मुसलमानों ने समझौता कर लिया है!” इस पर उन्होंने सोचा: “हमारी हिजरत, अपना घर-बार छोड़ना मुशरिकों की दुश्मनी की वजह से था। अब उनकी दुश्मनी दोस्ती में बदल गई है। तो चलें, रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत का शरफ़ हासिल करें।” उसी वक़्त जिबराईल अलैहिस्सलाम ने शैतान की यह चाल रसूलुल्लाह को बता दी। आपको बहुत दुख हुआ। अल्लाह पाक ने सूरह हज की 52वीं आयत-ए-करीमा नाज़िल फ़रमाई, जिसका मफ़हूम यह है: “तुमसे पहले हमने जो शरीअत वाले रसूल और उनकी पैरवी करने वाले नबी भेजे, जब भी उन्होंने आयत-ए-करीमा पढ़नी या अपनी तरफ़ से कोई बात कहनी चाही, तो शैतान ने उनके पढ़े हुए या कहे हुए में कुछ मिला दिया। अल्लाह तआला शैतान की मिलाई हुई चीज़ को सही से अलग कर देता है। फिर अपनी आयतों को मज़बूत कर देता है। अल्लाह तआला इंसानों के हालात को जानने वाला और अपना हुक्म नाफ़िज़ करने वाला है।” यह आयत सुनकर मुशरिक फिर से तकलीफ़ें और अज़ियतें देने लगे। मुहाजिर हब्शा के बादशाह से इजाज़त लेकर शव्वाल के महीने में मक्का मुकर्रमा आ गए। लेकिन उन्हें मालूम हुआ कि जो ख़बर उन्हें मिली थी, वह ग़लत थी।4 यह सब जानकर वे हैरान रह गए। फिर उन्होंने नबी-ए-करीम की ख़िदमत में आकर हब्शा के बारे में कहा: “हमने वहाँ अच्छी पड़ोसदारी और हिमायत पाई। हमारे दीन को किसी ने छेड़ा नहीं, हमें सताया नहीं गया। कोई नागवार बात भी नहीं सुनी। हमने इत्मीनान से अल्लाह तआला की इबादत की।”5 उन्होंने तफ़सील से बताया कि हब्शा का पानी, हवा और फल ताक़त देते हैं, वहाँ चार इबादतख़ाने हैं, हर दिन इन जगहों पर ऊँट और भेड़ें ज़बह की जाती हैं और ग़रीबों और परदेसियों को बुलाकर उनकी अच्छी ख़ातिर की जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि वहाँ के बादशाह ने ख़ुद आकर उनसे मुलाक़ात की, उन्हें अमान दी और उनकी तकलीफ़ें दूर कीं, और अपनी ख़ुशी का इज़हार किया।6 वे हब्शा में दो महीने से कुछ ज़्यादा रहे थे।
हज़रत हमज़ा का मुसलमान होना
बेसत का छठा साल… इस्लाम की आवाज़ हर गुज़रते दिन के साथ कानों-कान फैल रही थी, दिलों तक पहुँच रही थी और दूर-दूर तक जा रही थी। यह हाल क़ुरैश के मुशरिकों को पागल किए दे रहा था; सारी कोशिशों के बावजूद वे इस्लाम के फैलने को रोक नहीं पा रहे थे। “दलाइलुन नुबुव्वा” और “मआरिजुन नुबुव्वा” किताबों में यूँ बताया गया है:
मुशरिकों में वलीद नाम के एक शख़्स का एक बुत था। वे सफ़ा की पहाड़ी पर इकट्ठा होते और इस बुत की पूजा करते थे। एक दिन नबी-ए-करीम उनके पास गए और मुशरिकों को ईमान की दावत दी। एक काफ़िर जिन्न उस बुत के अंदर घुस गया और हमारे प्यारे नबी के बारे में नामुनासिब बातें कहीं। फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दुख हुआ। एक और दिन किसी ऐसी हस्ती ने, जो ख़ुद दिखाई नहीं देती थी, नबी-ए-करीम को सलाम किया और कहा: “या रसूलल्लाह! एक काफ़िर जिन्न ने आपके बारे में नामुनासिब बातें कहीं। मैंने उसे ढूँढकर मार डाला। अगर आप पसंद फ़रमाएँ, तो क्या कल सफ़ा की पहाड़ी पर तशरीफ़ लाएँगे? आप फिर उन्हें इस्लाम की दावत दीजिए। और मैं उस बुत के अंदर घुसकर आपकी तारीफ़ में बातें कहूँगा।” नबी-ए-करीम ने अब्दुल्लाह नाम के इस जिन्न की पेशकश क़बूल फ़रमा ली।
अगले दिन हमारे प्यारे नबी वहाँ तशरीफ़ ले गए और मुशरिकों को फिर ईमान की दावत दी।
अबू जहल भी वहाँ मौजूद था। मुशरिकों के हाथ में जो बुत था, मुसलमान जिन्न उसके अंदर घुस गया और हमारे प्यारे नबी और इस्लाम के बारे में ख़ूबसूरत बातें और शेर कहे। ये बातें सुनकर मुशरिकों ने अपने हाथ का वह बुत तोड़ फेंका और रसूलुल्लाह पर टूट पड़े। आपके मुबारक बाल बिखर गए। मुबारक चेहरा ख़ून में रंग गया। आपने उनकी इन तकलीफ़ों और ज़ुल्म को सहा और फ़रमाया: “ऐ क़ुरैश वालो! तुम मुझे मार रहे हो। मगर मैं तुम्हारा नबी हूँ।” फिर आप वहाँ से चलकर अपने घर तशरीफ़ ले आए। एक ख़ादिमा लड़की ने यह वाक़िआ शुरू से आख़िर तक देखा था। उस वक़्त हज़रत हमज़ा पहाड़ पर शिकार कर रहे थे। जब वह एक हिरन पर तीर चलाने वाले थे, तो हिरन बोल उठा: “ऐ हमज़ा! मुझ पर तीर चलाने के बजाय अगर तुम उन लोगों पर तीर चलाओ जो तुम्हारे भाई के बेटे को मार डालना चाहते हैं, तो ज़्यादा बेहतर होगा।” हज़रत हमज़ा इन बातों पर हैरान होकर तेज़ी से घर की तरफ़ चल पड़े। उनकी आदत थी कि शिकार से लौटते तो तवाफ़ के लिए पहले हरम शरीफ़ जाते, फिर घर जाते। उस दिन जब वह तवाफ़ कर रहे थे, तो ख़ादिमा लड़की उनके पास आई और बताया कि अबू जहल ने मुहम्मद अलैहिस्सलाम के साथ क्या किया है। जब हज़रत हमज़ा ने सुना कि नबी-ए-करीम का अपमान किया गया है, तो उनकी रिश्तेदारी की रगें फड़क उठीं। वह अपने हथियार लेकर उस जगह आए जहाँ मुशरिक थे। उन्होंने अबू जहल से कहा: “क्या तू ही है जिसने मेरे भाई के बेटे को बुरी बात कही और उनका दिल दुखाया? सुन, मेरा दीन भी उन्हीं का दीन है। अगर तुझमें ताक़त है, तो जो तूने उनके साथ किया, वह मेरे साथ भी करके दिखा!” और गले में लटकी कमान से अबू जहल का सिर फाड़ दिया। वहाँ मौजूद काफ़िरों ने हज़रत हमज़ा पर हमला करना चाहा। लेकिन अबू जहल ने कहा: “इसे हाथ न लगाओ, हमज़ा सही है। मैंने इसके भाई के बेटे को बुरी बातें कही थीं।” जब हज़रत हमज़ा वहाँ से चले गए, तो अबू जहल ने अपने आसपास वालों से कहा: “ख़बरदार, इसे न छेड़ना! यह हमसे नाराज़ होकर मुसलमान हो जाएगा। इसके ज़रिए मुहम्मद ताक़तवर हो जाएगा।” दरअसल हमज़ा इज़्ज़तदार, क़द्र वाले और ताक़तवर शख़्स थे। अबू जहल हज़रत हमज़ा को मुसलमान होने से रोकने के लिए अपना सिर फटने पर भी राज़ी हो गया था। हज़रत हमज़ा नबी-ए-करीम के पास आए और कहा: “ऐ मुहम्मद! मैंने तुम्हारे लिए अबू जहल से बदला ले लिया। उसे ख़ून में नहला दिया। दुखी न हो, ख़ुश हो जाओ!” हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “मैं ऐसी बातों से ख़ुश नहीं होता।” हज़रत हमज़ा ने कहा: “तुम्हें ख़ुश करने और ग़म से निकालने के लिए तुम जो चाहो, वही करूँगा!” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मैं तो सिर्फ़ इससे ख़ुश होऊँगा कि आप ईमान लाएँ और अपने क़ीमती जिस्म को जहन्नम की आग से बचा लें।”
हज़रत हमज़ा उसी वक़्त मुसलमान हो गए। उनके बारे में आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई। हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास के बयान के मुताबिक़, क़ुरआन-ए-करीम में सूरह अनआम की 122वीं आयत-ए-करीमा में जिसके बारे में “ज़िंदा किया गया और नूर अता किया गया” कहा गया है, वह हज़रत हमज़ा हैं, और जिसे “अँधेरों में भटकता फिरने वाला” कहा गया है, वह अबू जहल है।
हज़रत हमज़ा मुशरिकों के पास गए और एलान किया कि वह मुसलमान हो गए हैं और अल्लाह तआला के हबीब मुहम्मद अलैहिस्सलाम की हिफ़ाज़त करेंगे, चाहे इसकी क़ीमत उनकी जान ही क्यों न हो; फिर उन्होंने एक क़सीदा पढ़ा। उस क़सीदे में उन्होंने कहा: “अल्लाह तआला की हम्द हो, जिसने मेरे दिल को इस्लाम और हक़ की तरफ़ झुका दिया। यह दीन उस अल्लाह तआला ने भेजा है जो सारे जहानों का रब है, अपने बंदों के हर काम को जानता है, हर एक के साथ अपने लुत्फ़ से पेश आता है और जिसकी क़ुदरत हर चीज़ पर ग़ालिब है। जब क़ुरआन-ए-करीम पढ़ा जाता है, तो दिल और अक़्ल वालों की आँखों से आँसू बहते हैं। क़ुरआन-ए-करीम साफ़ और फ़सीह ज़बान में बयान की गई आयतों की सूरत में मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुआ। वह, मुहम्मद मुस्तफ़ा, हमारे बीच ऐसे मुबारक शख़्स हैं जिनकी बात मानी जाती है और जिनके आगे सिर झुकाया जाता है। ऐ मुशरिको! अपनी अक़्ल खोकर और अंधे होकर उनके बारे में सख़्त, भारी और भद्दी बातें न कहो। अगर तुमने ऐसा सोचा, तो जब तक हम मुसलमानों की लाशों पर से न गुज़रो, कोई उन्हें हाथ नहीं लगा सकेगा।”
“ऐ क़ुरैश वालो! तुम मुझे मार रहे हो। मगर मैं तुम्हारा नबी हूँ” हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम
हज़रत हमज़ा के मुसलमान होने पर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बहुत ख़ुश हुए। उनके भी शामिल हो जाने से मुसलमान बहुत ताक़तवर हो गए। हज़रत हमज़ा के मुसलमान होने से हालात बदल गए, क्योंकि मक्का वाले जानते थे कि हज़रत हमज़ा जंगजू, निडर, जवाँमर्द, पहलवान और बड़े बहादुर हैं। इसलिए क़ुरैश के मुशरिक अब मुसलमानों के साथ बिना किसी वजह के बुरा सुलूक न कर सके; ख़ास तौर पर हज़रत हमज़ा की तलवार की धार से डरते थे।7
आपके इश्क़ में राहों पर निकला,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
गुनहगार हूँ, मुँह है काला,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
हज़रत उमर का मुसलमान होना
इस्लाम का दीन दिन-ब-दिन फैल रहा था और क़ुरआन-ए-करीम का नूर रूहों को रौशन कर रहा था। जिनके नसीब में था, वे अल्लाह तआला के एहसान से ईमान ला रहे थे, हिदायत पा रहे थे। सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) होने के शरफ़ से मुशर्रफ़ ये मुबारक हज़रात हाथ में हाथ और दिल से दिल मिलाकर रसूलुल्लाह के गिर्द परवानों की तरह घूमते थे। आपकी छोटी-सी ख़्वाहिश और इशारे को भी बड़ा हुक्म समझते, उसे पूरा करने में एक-दूसरे से आगे बढ़ते, यहाँ तक कि इस राह में अपनी जानें क़ुरबान करने से भी न झिझकते। उधर मुशरिकों की घबराहट और फ़िक्र अपनी हद को पहुँच गई थी, क्योंकि मशहूर बहादुरों में से हज़रत हमज़ा भी मुसलमान होकर रसूलुल्लाह की सफ़ों में शामिल हो गए थे। इस अचानक पेश आए वाक़िए ने मुशरिकों को बिल्कुल आपे से बाहर कर दिया। इसी वजह से ख़त्ताब के बेटे उमर (वह अभी मुसलमान नहीं हुए थे) एक दिन इस इरादे से अपने घर से निकले कि रसूलुल्लाह को जहाँ देखेंगे, वहीं क़त्ल कर देंगे।
उन्होंने हमारे प्यारे नबी को मस्जिद-ए-हराम में नमाज़ पढ़ते हुए पाया। जब वह आपकी नमाज़ ख़त्म होने का इंतिज़ार कर रहे थे, तो आपकी तिलावत ने उमर का ध्यान खींच लिया, और वह शौक़ से सुनने लगे। हबीब-ए-अकरम सूरह हाक़्क़ा पढ़ रहे थे। मफ़हूम यह है: “वह होकर रहने वाली क़यामत!… क्या है वह होकर रहने वाली क़यामत (जानते हो)? और तुम्हें किस चीज़ ने बताया कि वह होकर रहने वाली क़यामत क्या है? समूद और आद (की क़ौमों) ने उस क़यामत को झुठलाया जिसकी दहशत से दिल काँप उठेंगे। तो समूद की क़ौम अपनी सरकशी की वजह से (जिबराईल अलैहिस्सलाम की चीख़ से) हलाक कर दी गई।
और आद की क़ौम एक तबाह कर देने वाली, झुलसा देने वाली, सनसनाती, बेक़ाबू और सख़्त हवा (आँधी) से हलाक कर दी गई। अल्लाह तआला ने उस आँधी को सात रात और आठ दिन लगातार उन पर मुसल्लत रखा। (वे ऐसे हाल को पहुँचे कि) अगर तुम उस वक़्त वहाँ मौजूद होते, तो देखते कि वे जड़ से उखड़कर ज़मीन पर गिरे हुए खजूर के खोखले तनों की तरह कैसे मरकर ढेर हो गए! अब क्या तुम उनमें से बची हुई कोई चीज़ (कोई शख़्स, कोई जानदार) देख सकते हो? फ़िरऔन ने भी, उससे पहले वालों ने भी, और उलट दी गई बस्तियों के लोगों ने भी (लूत की क़ौम ने) यही ख़ता (शिर्क और नाफ़रमानी) की… इस तरह उन्होंने अपने रब के नबी की (लूत अलैहिस्सलाम और दूसरों की) नाफ़रमानी की। इस पर उन्हें दूसरी उम्मतों पर आए अज़ाब से भी ज़्यादा सख़्त अज़ाब ने आ पकड़ा… बेशक जब (नूह के तूफ़ान में) पानी हर तरफ़ छा गया, तो हमने तुम्हें (तुम्हारे वुजूद का सबब बनने वाले तुम्हारे बाप-दादा को) कश्ती में सवार किया, ताकि वह तुम्हारे लिए इबरत बने और सुनने वाले कान उसे महफ़ूज़ रखें, याद रखें।
जब सूर में एक बार फूँक मारी जाएगी, और ज़मीन और पहाड़ अपनी जगहों से उठाकर एक-दूसरे से ज़ोर से टकराकर रेज़ा-रेज़ा कर दिए जाएँगे, तो उसी दिन क़यामत क़ायम हो जाएगी। उस दिन आसमान अपनी ताक़त और मज़बूती खोकर फट जाएगा और बिखर जाएगा।
और फ़रिश्ते आसमान के किनारों पर होंगे (अपने रब के हुक्म के मुंतज़िर)। उस दिन तुम्हारे रब के अर्श को (आसमान के गिर्द रहने वालों में से) आठ फ़रिश्ते उठाए होंगे। उस दिन तुम (हिसाब के लिए अल्लाह तआला के सामने) पेश किए जाओगे, (दुनिया में रहते हुए जिसे तुमने छिपा हुआ समझा था) तुम्हारा कोई राज़ (अल्लाह तआला से) छिपा न रहेगा। उस वक़्त जिसका आमालनामा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, वह (ख़ुश होकर) कहेगा: ‘लो, मेरा आमालनामा पढ़ो! मैं यक़ीनन जानता था कि मुझे अपने हिसाब का सामना करना है।’
तो वह पसंदीदा ज़िंदगी में होगा, बुलंद जन्नत में… जिसके (फल) तोड़ने के लिए क़रीब होंगे। (उनसे कहा जाएगा:) ’गुज़रे हुए दिनों में (दुनिया में) जो नेक अमल तुमने आगे भेजे, उनके बदले खाओ, पियो, मुबारक हो।’
और जिसका आमालनामा उसके बाएँ हाथ में दिया जाएगा, वह कहेगा: ’हाय! काश, मुझे मेरा आमालनामा न दिया जाता… और मैं न जानता कि मेरा हिसाब क्या है। हाय! काश, वह (मौत, मेरी ज़िंदगी का) पूरा ख़ात्मा कर देती (और मैं ज़िंदा न किया जाता)! मेरे माल ने मुझे कोई फ़ायदा न दिया। (मेरी सारी) बादशाहत (ताक़त, दलील, मेरा सब कुछ) मुझसे जुदा होकर बर्बाद हो गई!…’ (अल्लाह तआला जहन्नम पर मुक़र्रर फ़रिश्तों से फ़रमाएगा:) ’पकड़ो इसे और (इसके हाथ इसकी गर्दन से) बाँध दो!… फिर इसे जहीम में (जहन्नम के सबसे सख़्त अज़ाब की जगह में) झोंक दो! फिर इसे सत्तर गज़ लंबी एक ज़ंजीर में (और) जकड़ दो!… क्योंकि यह अल्लाह तआला पर ईमान नहीं रखता था। यह (ख़ुद खिलाना तो दूर, दूसरों को भी) ग़रीब को खाना देने पर नहीं उभारता था। इसलिए आज यहाँ इसका (इस पर तरस खाने वाला) कोई क़रीबी (और दोस्त) नहीं। और ग़िस्लीन के (जहन्नम वालों के ख़ून मिले पीप के) सिवा इसका कोई खाना भी नहीं। उसे (जान-बूझकर) ख़ता करने वालों (काफ़िरों) के सिवा कोई नहीं खाता…’”8 हज़रत उमर नबी-ए-करीम की तिलावत को बड़ी हैरत और पसंद से सुन रहे थे। ज़िंदगी में उन्होंने ऐसे ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ कभी नहीं सुने थे। इसे बाद में उन्होंने ख़ुद इस तरह बयान किया: “जो अल्फ़ाज़ मैंने सुने, उनकी बलाग़त, रवानी और गठावट पर मैं हैरान रह गया। मैंने अपने आप से कहा: ‘क़सम है, जैसा क़ुरैश कहते हैं, यह ज़रूर कोई शायर होगा!’” उसी वक़्त हमारे नबी ने आयत-ए-करीमा की तिलावत जारी रखी: “मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की जिन्हें तुम देखते हो और जिन्हें तुम नहीं देखते, बेशक यह (क़ुरआन-ए-करीम) अल्लाह तआला के यहाँ बहुत इज़्ज़त वाले एक रसूल का (अपने रब की तरफ़ से) लाया हुआ कलाम है। यह किसी शायर की बात नहीं। तुम कितना कम ईमान लाते हो!…”9 हज़रत उमर ने बयान किया: “मैंने फिर अपने आप से कहा: ‘यह कोई काहिन होगा, क्योंकि इसने मेरे दिल की बात समझ ली!…’” रसूलुल्लाह सूरह की तिलावत जारी रखे हुए थे: “और न यह किसी काहिन की बात है। तुम कितना कम सोचते हो!… यह (क़ुरआन-ए-करीम) सारे जहानों के रब की तरफ़ से (मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर जिबराईल अलैहिस्सलाम के ज़रिए) उतारा गया है। अगर वह (नबी) हम पर (हमारी न कही हुई) कुछ बातें अपनी तरफ़ से गढ़ लेते, तो हम ज़रूर उन्हें ताक़त से पकड़ लेते, फिर बेशक उनकी जान की रग (शह-रग) काटकर उन्हें हलाक कर देते!
“(ऐ चचा!) मैं तो सिर्फ़ इससे ख़ुश होऊँगा कि आप ईमान लाएँ और अपने क़ीमती जिस्म को जहन्नम की आग से बचा लें” हदीस शरीफ़
तुममें से कोई भी इसे रोक न पाता! बेशक यह (क़ुरआन-ए-करीम) तक़्वा वालों के लिए एक साफ़ नसीहत है। हम ज़रूर जानते हैं कि तुममें इसे झुठलाने वाले भी हैं (जैसे इसकी तस्दीक़ करने वाले हैं)। और बेशक यह (क़ुरआन-ए-करीम) काफ़िरों के लिए (कभी न छूटने वाली) हसरत और पछतावा है (आख़िरत में जब वे इसकी तस्दीक़ करने वालों को दी गई नेमतें देखेंगे)। और बेशक यह (क़ुरआन-ए-करीम) हक़्क़ुल यक़ीन है (यक़ीनन पक्के इल्म की हक़ीक़त है, पक्का इल्म ही है)। तो अपने अज़ीम रब के नाम की तस्बीह करो।”10
हज़रत उमर ने कहा: “रसूलुल्लाह ने जब पूरी सूरह पढ़ ली, तो मेरे दिल में इस्लाम की तरफ़ एक झुकाव पैदा हो गया।” हज़रत हमज़ा के मुसलमान होने के तीन दिन बाद अबू जहल ने मुशरिकों को इकट्ठा करके कहा: “ऐ क़ुरैश! मुहम्मद ने हमारे बुतों पर ज़बान चलाई। उसने कहा कि हमसे पहले गुज़रे हमारे बाप-दादा जहन्नम में अज़ाब भुगत रहे हैं और हम भी वहीं जाएँगे!…
उसे क़त्ल करने के सिवा कोई चारा नहीं!… जो उसे क़त्ल करेगा, उसे मैं सौ लाल ऊँट और बेहिसाब सोना दूँगा!…” एक ही पल में ख़त्ताब के बेटे उमर के दिल से इस्लाम की तरफ़ झुकाव मिट गया। वह अपनी जगह से उछलकर खड़े हुए और कहा: “यह काम ख़त्ताब के बेटे के सिवा कोई नहीं कर सकता।” “चलो, ऐ ख़त्ताब के बेटे! हम भी तुम्हें देखें!” कहकर लोगों ने उनके लिए तालियाँ बजाईं।
वह अपनी तलवार कमर में बाँधकर निकल पड़े। रास्ते में उनकी मुलाक़ात नुऐम इब्ने अब्दुल्लाह से हुई। नुऐम ने पूछा: “इतने ग़ुस्से और जोश में कहाँ जा रहे हो, ऐ उमर?” उमर ने कहा: “उस मुहम्मद को क़त्ल करने जा रहा हूँ, जिसने लोगों में फूट डाल दी है और भाई को भाई का दुश्मन बना दिया है।” नुऐम ने कहा: “ऐ उमर! यह मुश्किल काम है। उनके साथी परवानों की तरह उनके गिर्द घूमते हैं, उन्हें कुछ हो न जाए, इस फ़िक्र में काँपते रहते हैं। उनके पास पहुँचना बहुत मुश्किल है। अगर तुमने उन्हें क़त्ल कर भी दिया, तो बनू अब्दुल मुत्तलिब के हाथ से अपना गिरेबान न छुड़ा सकोगे।”
हज़रत उमर इन बातों पर बहुत ग़ुस्सा हुए। “कहीं तुम भी तो उन्हीं में से नहीं? पहले तुम्हारा ही काम तमाम कर दूँ!” कहकर उन्होंने तलवार पर हाथ डाला। नुऐम ने कहा: “ऐ उमर! मुझे छोड़ो! बेहतर है कि तुम अपनी बहन फ़ातिमा और उनके शौहर सईद इब्ने ज़ैद के पास जाओ; वे भी मुसलमान हो गए हैं।” हज़रत उमर को इस बात का यक़ीन न आया। नुऐम ने कहा: “यक़ीन नहीं आता तो जाकर पूछ लो! समझ जाओगे।”
अगर हज़रत उमर यह काम कर गुज़रते, तो दीन का बँटवारा तो ख़त्म हो जाता, लेकिन अरबों का रिवाज, यानी ख़ून का बदला, सामने आ जाता और क़ुरैश दो हिस्सों में बँट जाते और कभी न ख़त्म होने वाली लड़ाइयाँ शुरू हो जातीं। इस तरह सिर्फ़ उमर इब्ने ख़त्ताब ही नहीं, बल्कि सारे बनू ख़त्ताब क़त्ल कर दिए जाते। लेकिन उमर इब्ने ख़त्ताब बहुत ताक़तवर, निडर और ग़ुस्सैल थे, इसलिए यह सब सोच न सके। बहन की फ़िक्र में वह फ़ौरन उनके घर की तरफ़ चल पड़े।
उन दिनों सूरह ताहा नई-नई नाज़िल हुई थी। सईद और फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने उसे लिखवाया था और हज़रत ख़ब्बाब इब्ने अरत नाम के सहाबी को अपने घर बुलाकर उसे पढ़ रहे थे। हज़रत उमर ने दरवाज़े पर से उनकी आवाज़ सुनी। उन्होंने बहुत ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। उन्हें कमर में तलवार बाँधे, ग़ुस्से की हालत में देखकर घर वालों ने लिखा हुआ हिस्सा छिपा दिया और हज़रत ख़ब्बाब को भी छिपा दिया। फिर दरवाज़ा खोला। अंदर आते ही हज़रत उमर ने पूछा: “तुम क्या पढ़ रहे थे?” उन्होंने कहा: “कुछ नहीं।”
उनका ग़ुस्सा और भड़क उठा और वह चिल्लाए: “तो जो मैंने सुना था, वह सच है; तुम भी उसके जादू के धोखे में आ गए हो!” उन्होंने हज़रत सईद को गिरेबान से पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया। जब उनकी बहन ने अपने शौहर को छुड़ाना चाहा, तो उन्होंने ग़ुस्से में उनके चेहरे पर भी थप्पड़ मार दिया। जब देखा कि उनके चेहरे से ख़ून बहने लगा है, तो उन्हें बहन पर तरस आया। फ़ातिमा को गहरी चोट लगी थी, वह ख़ून में लथपथ थीं। लेकिन ईमान की ताक़त ने उन्हें हरकत में ला दिया, और अल्लाह तआला की पनाह लेकर उन्होंने कहा: “ऐ उमर! तुम अल्लाह से शर्म क्यों नहीं करते, उसके उस नबी पर ईमान क्यों नहीं लाते जिसे उसने आयतों और मोजिज़ों के साथ भेजा है? लो, मैं और मेरे शौहर मुसलमान होने के शरफ़ से मुशर्रफ़ हो चुके हैं। तुम हमारे सिर भी काट दो, तब भी हम इससे नहीं फिरेंगे।” और उन्होंने कलिमा-ए-शहादत पढ़ा।
बहन का यह ईमान देखकर हज़रत उमर अचानक नरम पड़ गए और ज़मीन पर बैठ गए। नरम आवाज़ में कहा: “ज़रा वह किताब तो निकालो जो तुम पढ़ रहे थे।” फ़ातिमा ने कहा: “जब तक तुम पाक न हो जाओ, मैं उसे तुम्हें नहीं दूँगी।” हज़रत उमर ने ग़ुस्ल किया।
फिर फ़ातिमा क़ुरआन-ए-करीम का सफ़ा ले आईं। हज़रत उमर अच्छा पढ़ते थे। उन्होंने सूरह ताहा पढ़नी शुरू की। क़ुरआन-ए-करीम की फ़साहत, बलाग़त, मानी और बड़ाइयाँ उनके दिल को धीरे-धीरे नरम करती गईं। “आसमानों में, ज़मीन में, उनके बीच में और (सात तह) मिट्टी के नीचे जो कुछ है, सब उसी का है”11 – इस मफ़हूम वाली आयत-ए-करीमा को पढ़ा तो वह गहरी सोच में डूब गए। उन्होंने कहा: “ऐ फ़ातिमा! ये कभी न ख़त्म होने वाली सारी चीज़ें उसी अल्लाह की हैं जिसकी तुम इबादत करते हो?” बहन ने जवाब दिया: “हाँ, और क्या! क्या कोई शक है?” उनकी हैरत बढ़ती गई; उन्होंने कहा: “ऐ फ़ातिमा! हमारे पास सोने, चाँदी, काँसे और पत्थर से तराशे हुए, सजे-सजाए कोई डेढ़ हज़ार बुत हैं। उनमें से किसी की भी ज़मीन पर कोई चीज़ नहीं।” उन्होंने थोड़ा और पढ़ा और “अल्लाह तआला के सिवा कोई इबादत के लायक़, पूजा के लायक़ सच्चा इलाह नहीं। सबसे अच्छे नाम उसी के हैं”12 – इस मफ़हूम वाली आयत-ए-करीमा पर ग़ौर किया। “सचमुच, कितना सही है!” उन्होंने कहा। यह सुनकर ख़ब्बाब अपनी छिपने की जगह से उछलकर बाहर आए और तकबीर कही। फिर कहा: “ख़ुशख़बरी हो, ऐ उमर! रसूलुल्लाह ने अल्लाह तआला से दुआ करते हुए फ़रमाया था: ‘या रब! इस दीन को अबू जहल या उमर के ज़रिए ताक़त दे!’ लो, यह दौलत, यह ख़ुशनसीबी तुम्हारे नसीब में आई।”
इस आयत-ए-करीमा और इस दुआ ने हज़रत उमर के दिल की दुश्मनी को धो-पोंछकर साफ़ कर दिया। उन्होंने फ़ौरन कहा: “रसूलुल्लाह कहाँ हैं?” उनका दिल अब रसूलुल्लाह से जुड़ चुका था। उस दिन रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हज़रत अरक़म के घर में अपने सहाबा को नसीहत फ़रमा रहे थे। सहाबा-ए-किराम वहाँ इकट्ठा थे; आपके नूरानी चेहरे को देखकर और आपकी मीठी, असरदार बातें सुनकर अपने दिलों को चमका रहे थे, और बेहद लज़्ज़त, ज़ौक़ और ख़ुशी में एक हाल से दूसरे हाल में पहुँचते हुए अपनी रूहों को ताज़गी दे रहे थे।
अरक़म के घर से दिखाई दिया कि हज़रत उमर आ रहे हैं। उनकी तलवार भी उनके पास थी। चूँकि वह रोबदार और ताक़तवर थे, इसलिए सहाबा-ए-किराम ने रसूलुल्लाह को घेर लिया। हज़रत हमज़ा ने कहा: “उमर से डरने की क्या बात है? अगर भलाई के साथ आए हैं, तो ख़ुश आमदीद। वरना तलवार खींचने से पहले ही उनका सिर उड़ा दूँगा!” उसी वक़्त रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “रास्ता दो, अंदर आने दो!”
“और न यह किसी काहिन की बात है। तुम कितना कम सोचते हो!… यह (क़ुरआन-ए-करीम) सारे जहानों के रब की तरफ़ से (मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर जिबराईल अलैहिस्सलाम के ज़रिए) उतारा गया है” हाक़्क़ा: 42–43
जिबराईल अलैहिस्सलाम इससे पहले ही ख़बर दे चुके थे कि हज़रत उमर ईमान लाने के लिए आ रहे हैं और रास्ते में हैं। रसूलुल्लाह ने मुस्कुराकर हज़रत उमर का इस्तिक़बाल किया और फ़रमाया: “इन्हें छोड़ दो, इनके पास से हट जाओ।” हज़रत उमर रसूलुल्लाह के सामने घुटनों के बल बैठ गए। रसूलुल्लाह ने हज़रत उमर का बाज़ू पकड़कर फ़रमाया: “ईमान ले आओ, ऐ उमर!” और उन्होंने साफ़ दिल से कलिमा-ए-शहादत पढ़ा। सहाबा-ए-किराम ने ख़ुशी से तकबीर की आवाज़ें आसमान तक बुलंद कीं।
हज़रत उमर ने मुसलमान होने के बाद अपना हाल इस तरह बयान किया:
“जब मैं मुसलमान हुआ, तो सहाबा-ए-किराम मुशरिकों से छिपते थे और अपनी इबादतें छिपकर करते थे। मुझे इस पर बहुत दुख हुआ और मैंने पूछा: ‘या रसूलल्लाह! क्या हम हक़ पर नहीं हैं?’ नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: ‘हाँ। उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, तुम मुर्दा हो या ज़िंदा, यक़ीनन तुम हक़ पर हो।’
इस पर मैंने कहा: ‘या रसूलल्लाह! जब हम हक़ पर हैं और मुशरिक बातिल रास्ते पर हैं, तो फिर हम अपना दीन क्यों छिपाते हैं? अल्लाह की क़सम, इस्लाम के दीन को कुफ़्र के मुक़ाबले में खुलकर ज़ाहिर करने का हक़ हमें ज़्यादा है और हम इसके ज़्यादा लायक़ हैं। अल्लाह तआला का दीन मक्का में यक़ीनन ग़ालिब आएगा। अगर हमारी क़ौम हमसे इंसाफ़ से पेश आए, तो क्या ख़ूब, और अगर वे ज़्यादती करना चाहें, तो हम उनसे लड़ेंगे।’ रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘हम तादाद में बहुत कम हैं!’
मैंने कहा: ‘या रसूलल्लाह! उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको सच्चा नबी बनाकर भेजा है, मुशरिकों की कोई ऐसी मजलिस बाक़ी न रहेगी जिसमें मैं बिना झिझके और बिना डरे बैठकर इस्लाम बयान न करूँ। अब हम खुलकर सामने आएँ!’ जब आपने इसे क़बूल फ़रमाया, तो हम दो सफ़ें बनाकर बाहर निकले और हरम शरीफ़ की तरफ़ चल पड़े। एक सफ़ के आगे हमज़ा थे और दूसरी के आगे मैं। ज़मीन को आटा बना देने वाले सख़्त क़दमों से, बावक़ार और रोबदार चाल से हम मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल हुए। क़ुरैश के मुशरिक कभी मुझे देखते, कभी हमज़ा को। उन पर ऐसा ग़म और रंज छा गया कि शायद ज़िंदगी में वे कभी ऐसी मायूसी में न पड़े थे।” जब हज़रत उमर इस तरह आए, तो अबू जहल आगे बढ़ा और पूछा: “ऐ उमर! यह क्या हाल है?” तो हज़रत उमर ने उसकी ज़रा भी परवाह किए बिना कहा: “अशहदु अल ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।” अबू जहल को समझ न आया कि क्या कहे। वह सन्न रह गया। हज़रत उमर ने मुशरिकों के इस टोले की तरफ़ मुड़कर कहा: “ऐ क़ुरैश!… जो मुझे जानता है, वह जानता है! जो नहीं जानता, वह जान ले कि मैं ख़त्ताब का बेटा उमर हूँ… जो अपनी बीवी को बेवा और अपने बच्चों को यतीम छोड़ना चाहता हो, वह अपनी जगह से हिले! जो भी हिलेगा, उसे अपनी तलवार से काटकर ज़मीन पर गिरा दूँगा!…” यह सुनकर क़ुरैश के मुशरिक पल भर में तितर-बितर होकर वहाँ से दूर हो गए। रसूलुल्लाह और आपके बुलंद सहाबा ने सफ़ बाँधकर ऊँची आवाज़ से तकबीर कही। मक्का के आसमान सहाबा-ए-किराम की “अल्लाहु अकबर!… अल्लाहु अकबर!…” की सदाओं से गूँज उठे। पहली बार हरम शरीफ़ में खुलेआम नमाज़ पढ़ी गई।13 हज़रत उमर मुसलमान हुए तो सूरह अनफ़ाल की 64वीं आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई। मफ़हूम यह है: “ऐ मेरे नबी! तुम्हारे मददगार के तौर पर अल्लाह तआला और मोमिनों में से वे लोग काफ़ी हैं जो तुम्हारे पीछे चलते हैं।” शक में डूबे, डगमगाते हुए कुछ लोगों ने जब देखा कि हज़रत उमर मुसलमान हो गए हैं, तो उन्होंने इस्लाम को चुन लिया और सहाबी होने के शरफ़ को पहुँचे।
अब मुसलमानों की तादाद दिन-ब-दिन बर्फ़ के तोदे की तरह बढ़ने लगी।
“या रब! इस दीन को अबू जहल या उमर के ज़रिए ताक़त दे!” हदीस शरीफ़
हर काम में रहमान का नाम लेते थे वह सख़ावत की खान,
तारीफ़ और हम्द की खान थे नबी, वह सख़ावत की खान।
इलाही मेहरबानियों का मज़हर, इल्म और हिल्म का सरचश्मा थे,
अच्छे अख़लाक़ से भरी हुई थी वह जान, वह सख़ावत की खान।
अल्लाह के लिए हक़ की मख़लूक़ से नरमी और आजिज़ी बरतकर,
सारी ख़ल्क़ पर लुत्फ़-ओ-एहसान करते थे वह सख़ावत की खान।
काबा मुअज़्ज़मा का पुराना मंज़र मक्का मुकर्रमा
हब्शा की तरफ़ दूसरी हिजरत
सहाबा-ए-किराम (अलैहिमुर रिज़वान) जब मक्का लौटे, तो मुशरिकों ने उन्हें फिर से तकलीफ़ें और अज़ियतें देनी शुरू कर दीं। उनका ज़ुल्म दिन-ब-दिन बढ़ता गया। वे बेझिझक हर तरह का सितम ढाते थे। एक दिन हज़रत उस्मान ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मैंने हब्शा को तिजारत के लिए अच्छी जगह पाया है। एक महीने की तिजारत बहुत नफ़ा देती है। जब तक अल्लाह तआला हिजरत की जगह मुक़र्रर न फ़रमाए, मुसलमानों के लिए इससे बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती। कम से कम मोमिन क़ुरैश के ज़ुल्म से तो छूट जाएँगे। नज्जाशी की हम पर बहुत मेहरबानियाँ और काफ़ी एहसान हैं।” इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “फिर से हब्शा लौट जाओ, ताकि अल्लाह तआला के नाम से महफ़ूज़ रहो।” हज़रत उस्मान ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! अगर आप ख़ुद वहाँ तशरीफ़ ले चलें, तो शायद वे मुसलमान हो जाएँ। वे अहले किताब हैं, इसलिए जल्दी इस्लाम में आ जाएँगे और अपनी मदद से दरेग़ नहीं करेंगे।” तो हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “मुझे सुकून और आराम ढूँढने का हुक्म नहीं दिया गया। हिजरत के मामले में मैं अल्लाह तआला के मुबारक हुक्म का इंतिज़ार कर रहा हूँ। जैसा हुक्म होगा, वैसा ही करूँगा।”
बेसत के छठे साल, एक रिवायत के मुताबिक़, सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में से 83 मर्दों और 18 औरतों पर मुश्तमिल एक सौ एक लोगों का एक क़ाफ़िला दूसरी बार हब्शा की तरफ़ रवाना हुआ। इस क़ाफ़िले का अमीर हज़रत जाफ़र इब्ने अबी तालिब को मुक़र्रर किया गया था। वे सही-सलामत नज्जाशी के मुल्क पहुँच गए। हब्शा में पेश आए वाक़िआत को हज़रत उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने इस तरह बयान किया: “जब हम हब्शा पहुँचे, तो वहाँ हमें एक बहुत अच्छा पड़ोसी मिला। यह पड़ोसी बादशाह नज्जाशी थे। उन्होंने हमारी हर ख़्वाहिश पूरी की। हम अपने दीन के हुक्मों पर जैसे चाहते, अमल कर सकते थे। अल्लाह तआला की आज़ादी से इबादत कर सकते थे, कोई तकलीफ़ नहीं उठाते थे। कोई बुरी बात भी नहीं सुनते थे।” जब मक्का के मुशरिकों को इस हाल की ख़बर हुई, तो उन्होंने हब्शा के बादशाह के पास दो सफ़ीर भेजने का फ़ैसला किया। नज्जाशी के लिए बेहद क़ीमती चीज़ों के साथ-साथ मक्का के उस चमड़े के तोहफ़े भी तैयार किए गए जिसे वह बहुत पसंद करते थे। इसके अलावा मज़हबी पेशवाओं और सल्तनत के बड़े ओहदेदारों के लिए भी तोहफ़े सोचे गए। यह काम अब्दुल्लाह इब्ने अबी रबीआ और अम्र इब्ने आस को सौंपा गया। इन दोनों सफ़ीरों को सिखाया गया कि नज्जाशी के सामने क्या-क्या कहना है। उनसे कहा गया: “बादशाह से बात करने से पहले उसके बतरीक़ों (बड़े पादरियों) और उसके सिपहसालारों में से हर एक को उसका तोहफ़ा दे देना। फिर नज्जाशी का तोहफ़ा पेश करना। यह करने के बाद वहाँ के मुसलमानों को अपने हवाले करने की माँग करना। नज्जाशी को मुसलमानों से मिलने और बात करने का मौक़ा न देना।”14 सफ़ीर हब्शा आए। सल्तनत के बड़े ओहदेदारों से मिलकर उनके तोहफ़े देने के बाद उन्होंने उनमें से हर एक से कहा: “हमारे बीच कुछ लोग उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने एक नया दीन गढ़ लिया है, जिसे न हम जानते हैं न तुम। हम इन आने वालों को उनके वतन वापस ले जाना चाहते हैं। जब तुम अपने बादशाह से इनके बारे में बात करो, तो कोशिश करना कि इनसे बात किए बिना ही इन्हें हमारे हवाले कर दिया जाए। इन लोगों का मामला सबसे बेहतर इनके अपने माँ-बाप और पड़ोसी देख सकते हैं। वे इन्हें बहुत अच्छी तरह जानते हैं।”15 बतरीक़ों ने यह तजवीज़ मान ली। फिर मक्का के सफ़ीरों ने नज्जाशी के तोहफ़े पेश किए। बादशाह नज्जाशी ने तोहफ़े क़बूल किए, उन्हें बुलाया और कुछ देर उनसे बात की।
“फिर से हब्शा लौट जाओ, ताकि अल्लाह तआला के नाम से महफ़ूज़ रहो” हदीस शरीफ़
सफ़ीरों ने नज्जाशी से कहा: “ऐ बादशाह! हमारे बीच के कुछ लोगों ने आपके मुल्क में पनाह ली है। इन आने वालों ने जिस तरह अपनी क़ौम का दीन छोड़ दिया, उसी तरह आपके दीन में भी दाख़िल नहीं हुए। इनका अपनी अक़्ल के मुताबिक़ गढ़ा हुआ एक दीन है। इस दीन को न हम जानते हैं, न आप। हमें आपके पास उस क़ौम के शरीफ़ों ने भेजा है जिससे ये ताल्लुक़ रखते हैं। ये शरीफ़ लोग उन आदमियों के बाप और सगे रिश्तेदार हैं जिन्होंने आपके मुल्क में पनाह ली है। उनकी ख़्वाहिश है कि आने वालों को वापस कर दिया जाए, क्योंकि वे इनके हाल को ज़्यादा क़रीब से जानते हैं। उन्हें ज़्यादा अच्छी तरह मालूम है कि ये अपने असली दीन में किस चीज़ को नापसंद करते थे…” अम्र इब्ने आस और अब्दुल्लाह इब्ने अबी रबीआ दोनों की सबसे बड़ी ख़्वाहिश यही थी कि नज्जाशी ये बातें सुनकर उनकी मर्ज़ी के मुताबिक़ अमल करें। सफ़ीरों के ये बातें कहने के बाद नज्जाशी के बतरीक़ों ने बात शुरू की और कहा: “इन्होंने बिल्कुल सही कहा। इनकी क़ौम उनसे बेहतर निपट सकती है, वही बेहतर समझ सकती है कि उन्हें क्या पसंद है और क्या नापसंद। इसलिए आप इन आदमियों को हवाले कर दें, ताकि ये उन्हें उनके वतन और उनकी क़ौम में ले जाएँ।” बादशाह नज्जाशी इन बातों पर बहुत नाराज़ हुए और बोले: “अल्लाह की क़सम, हरगिज़ नहीं! मैं इन लोगों को हवाले नहीं करूँगा। जिन्होंने मेरी पनाह ली और मेरे मुल्क में आए, उनसे मैं ग़द्दारी नहीं कर सकता। इन्होंने दूसरों के मुक़ाबले में मुझे तरजीह दी और मेरे मुल्क में आए। इसलिए मैं आए हुए मुहाजिरों को अपने महल में बुलाऊँगा, उनसे पूछूँगा कि इन लोगों की बातों के जवाब में वे क्या कहते हैं, और उनका जवाब सुनूँगा। अगर मुहाजिर वैसे ही हैं जैसा ये कहते हैं, तो उन्हें इनके हवाले करके उनकी क़ौम में लौटा दूँगा। अगर ऐसा नहीं है, तो उनकी हिफ़ाज़त करूँगा, और जब तक वे मेरे मुल्क में रहें, उनके साथ भलाई करूँगा।” इससे पहले नज्जाशी आसमानी किताबों का मुतालआ कर चुके थे। वह जानते थे कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम के आने का वक़्त क़रीब है, आपकी क़ौम आपको झूठा कहकर आप पर ईमान नहीं लाएगी और आपको मक्का से निकाल देगी। नज्जाशी ने मक्का के सफ़ीरों से पूछा: “ये किस पर ईमान रखते हैं?” उन्होंने कहा: “मुहम्मद पर।” यह नाम सुनते ही नज्जाशी समझ गए कि आप नबी हैं, मगर उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया। उन्होंने सफ़ीरों से फिर पूछा: “उनका दीन और मसलक क्या है, और वह किस चीज़ की दावत देते हैं?” अम्र ने कहा: “उसका कोई मसलक नहीं।” नज्जाशी ने कहा: “जिस गिरोह का मसलक और दीन मुझे मालूम नहीं और जिसने मेरी पनाह ली है, उसे मैं कैसे हवाले कर दूँ? हम एक मजलिस क़ायम करें, उन्हें भी बुलाएँ और तुम्हें उनके आमने-सामने बिठाएँ, ताकि तुम सबका हाल साफ़ हो जाए और मैं उनका दीन भी जान लूँ।” मुसलमानों को महल में बुलाया गया। मुसलमानों ने पहले आपस में मशवरा किया और कहने लगे: “हब्शा के बादशाह से क्या कहें कि उन्हें पसंद आए और उनके मिज़ाज के मुताबिक़ हो?” हज़रत जाफ़र ने फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम, इस मामले में हम जो जानते हैं, वह बस वही है जो हमारे नबी ने हमें फ़रमाया है। नतीजा जो भी निकले, हम राज़ी हैं।” सबने यह मान लिया और इस पर इत्तिफ़ाक़ करके कि सिर्फ़ हज़रत जाफ़र बात करेंगे, नज्जाशी के दरबार में आए। बादशाह नज्जाशी ने भी अपने आलिमों को इकट्ठा किया। एक बड़ा दरबार लगा। फिर मुहाजिरों को अंदर लाया गया। मुसलमानों ने अंदर आकर सलाम किया।
लेकिन उन्होंने सज्दा नहीं किया। जब नज्जाशी ने उनसे पूछा: “तुमने सज्दा क्यों नहीं किया?”, तो उन्होंने जवाब दिया: “हम अल्लाह तआला के सिवा किसी को सज्दा नहीं करते। नबी-ए-करीम ने हमें अल्लाह तआला के सिवा किसी और को सज्दा करने से मना किया है और फ़रमाया है: ‘सज्दा सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए ख़ास है।’” नज्जाशी ने मुहाजिरों से कहा: “ऐ मेरे दरबार में आए हुए लोगो! मुझे बताओ। मेरे मुल्क में किसलिए आए हो? तुम्हारा हाल क्या है? तुम ताजिर नहीं हो, तुम्हारी कोई माँग भी नहीं। तुम्हारे बीच जो नबी ज़ाहिर हुए हैं, उनका हाल क्या है? तुम उस तरह सलाम क्यों नहीं करते जिस तरह तुम्हारे मुल्क से यहाँ आने वाले सलाम करते हैं?”
जाफ़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहा: “ऐ बादशाह! मैं पहले तीन बातें कहूँगा। अगर मैं सच कहूँ, तो मेरी तस्दीक़ कीजिए; अगर झूठ कहूँ, तो मुझे झुठला दीजिए। सबसे पहले हुक्म दीजिए कि इन आदमियों में से सिर्फ़ एक बोले, दूसरा चुप रहे!”
अम्र इब्ने आस ने कहा: “मैं बोलूँगा।” नज्जाशी ने कहा: “ऐ जाफ़र, पहले तुम बोलो।”
हज़रत जाफ़र ने कहा: “मेरी तीन बातें हैं। इस आदमी से पूछिए: क्या हम ऐसे ग़ुलाम हैं जिन्हें पकड़कर उनके मालिकों को लौटाया जाना चाहिए?” नज्जाशी ने पूछा: “ऐ अम्र! क्या ये ग़ुलाम हैं?” अम्र ने कहा: “नहीं! ये ग़ुलाम नहीं, आज़ाद हैं!” हज़रत जाफ़र ने कहा: “क्या हमने नाहक़ किसी का ख़ून बहाया है, कि हमें उन लोगों के हवाले किया जाए जिनका ख़ून बहाया गया?” नज्जाशी ने अम्र से पूछा: “क्या इन्होंने नाहक़ किसी को क़त्ल किया है?”, तो अम्र ने कहा: “नहीं, इन्होंने ख़ून का एक क़तरा भी नहीं बहाया।” हज़रत जाफ़र ने नज्जाशी से कहा: “क्या हमारे ज़िम्मे दूसरों के माल में से नाहक़ लिया हुआ कोई माल है, जिसका चुकाना हम पर लाज़िम हो?” नज्जाशी ने कहा: “ऐ अम्र! अगर इन बेचारों को बहुत सारा सोना भी चुकाना हो, अगर इन पर क़र्ज़ है, तो वह मैं चुकाऊँगा, बताओ!” अम्र ने कहा: “नहीं, एक क़ीरात (एक सिक्के की इकाई) भी नहीं!” नज्जाशी ने पूछा: “तो फिर तुम इनसे क्या चाहते हो?”, तो अम्र ने कहा: “ये और हम एक दीन पर, एक रास्ते पर थे। इन्होंने उसे छोड़ दिया। मुहम्मद और उसके दीन के पीछे चल पड़े।” नज्जाशी ने जाफ़र से पूछा: “तुमने अपना पहला दीन छोड़कर किसलिए दूसरे की पैरवी की? जब तुम अपनी क़ौम के दीन से भी अलग हो गए और मेरे दीन में भी नहीं हो, तो यह दीन जिस पर तुम ईमान रखते हो, कैसा है? क्या इसके बारे में कुछ बताओगे?”
हज़रत जाफ़र ने कहा: “ऐ बादशाह! हम एक जाहिल क़ौम थे। बुतों को पूजते थे। मुर्दार खाते, हर तरह की बुराई करते थे। रिश्तेदारों से नाते तोड़ते, पड़ोसियों से अच्छा सुलूक नहीं करते थे। हमारे ताक़तवर कमज़ोरों पर ज़ुल्म करते थे और रहम क्या होता है, नहीं जानते थे। हम इसी हाल में रहे, यहाँ तक कि अल्लाह तआला ने हमारी तरफ़ ख़ुद हममें से एक ऐसे नबी को भेजा जिनकी सच्चाई, अमानतदारी, पाकदामनी, पाकीज़गी और ख़ानदानी शराफ़त को हम जानते थे। उस नबी ने हमें दावत दी कि अल्लाह तआला के वुजूद और उसकी वहदानियत पर ईमान लाएँ, उसकी इबादत करें, और उन पत्थरों और बुतों को छोड़ दें जिन्हें हम और हमारे बाप-दादा पूजते आए थे। उन्होंने हमें हुक्म दिया कि सच बोलें, अमानत में ख़यानत न करें, रिश्तेदारी के हक़ अदा करें, पड़ोसियों से मेल-जोल से रहें, गुनाहों और ख़ूनख़राबे से बचें। हमें हर तरह की बेहयाई, झूठ बोलने, यतीमों का माल हड़पने और पाकदामन औरतों पर तोहमत लगाने से मना किया। हमें हुक्म दिया कि अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक ठहराए बिना उसकी इबादत करें। हमने इसे क़बूल किया, और वह अल्लाह तआला की तरफ़ से जो कुछ लाए, उस सब पर ईमान लाए और उनकी बातों पर अमल किया। अल्लाह तआला की इबादत की। जिसे उसने हम पर हराम किया, उसे हराम और जिसे हलाल किया, उसे हलाल माना और उसी पर अमल किया। इसी वजह से हमारी क़ौम हमारी दुश्मन बन गई और हम पर ज़ुल्म किया। हमें हमारे दीन से फेरने, अल्लाह तआला की इबादत से बेज़ार करके फिर बुतों की पूजा कराने के लिए तरह-तरह की अज़ियतों और मुसीबतों में डाला। हम पर ज़ुल्म किया। जितना दबाया, उससे और ज़्यादा दबाया। वे हमारे और हमारे दीन के बीच आ गए और हमें हमारे दीन से जुदा करना चाहा। तब हमने अपना वतन, अपना घर छोड़ा और आपके मुल्क में पनाह ली। आपको दूसरों पर तरजीह दी। आपकी हिमायत और आपके पड़ोस की तमन्ना की। हमें उम्मीद है कि आपके पास हम पर ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी न होगी।” हज़रत जाफ़र ने अपनी बात इस तरह जारी रखी: “रहा सलाम का मामला, तो हमने आपको रसूलुल्लाह के सलाम से सलाम किया। हम एक-दूसरे को भी इसी तरह सलाम करते हैं। नबी-ए-करीम ने ख़बर दी है कि जन्नत वालों का सलाम भी यही है। इसलिए हमने आपकी बुलंद ज़ात को इसी तरह सलाम किया। चूँकि नबी-ए-करीम ने फ़रमाया है कि इंसानों को सज्दा नहीं किया जाएगा, इसलिए हम अल्लाह तआला के सिवा किसी को सज्दा करने से अल्लाह तआला की पनाह माँगते हैं।” नज्जाशी ने पूछा: “क्या तुम्हें उसमें से कुछ याद है जो अल्लाह ने बताया है?” हज़रत जाफ़र ने कहा: “हाँ”, तो नज्जाशी ने कहा: “उसे मुझे पढ़कर सुनाओ।” हज़रत जाफ़र ने सूरह मरयम की शुरू की आयतें पढ़नी शुरू कीं (यह भी बताया गया है कि उन्होंने सूरह अनकबूत और सूरह रूम में से पढ़ा)। नज्जाशी रो रहे थे। उनकी आँखों से बहते आँसुओं ने उनकी दाढ़ी भिगो दी। राहिब भी रोए। नज्जाशी और राहिबों ने कहा: “ऐ जाफ़र! इस मीठे और ख़ूबसूरत कलाम में से थोड़ा और पढ़ो।” हज़रत जाफ़र ने सूरह कह्फ़ के शुरू से पढ़ा, जिसमें मफ़हूमन यह फ़रमाया गया है: “तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने काफ़िरों को (अपनी बुलंद) बारगाह से आने वाले सबसे सख़्त अज़ाब (जहन्नम) से डराने, नेक अमल करने वाले मोमिनों को ऐसे अच्छे अज्र (जन्नत) की ख़ुशख़बरी देने के लिए जिसमें वे हमेशा रहेंगे, और ‘अल्लाह तआला ने औलाद बना ली’ कहने वालों को डराने के लिए, ऐसी किताब, जिसके अल्फ़ाज़ में कोई टेढ़ और जिसके मानी में कोई तज़ाद नहीं रखा, (ज़्यादती और कमी से दूर) बिल्कुल सीधी किताब (क़ुरआन-ए-करीम) अपने बंदे (मुहम्मद अलैहिस्सलाम) पर उतारी। न उन्हें (‘अल्लाह तआला ने औलाद बना ली’ कहने वालों को), न उनके बाप-दादा को इसका (इस बात का) कोई इल्म (और जानकारी) है। उनके मुँह से निकलने वाली यह बात (भारी और) बेहद ख़तरनाक है। वे सिर्फ़ झूठ ही बोलते हैं। (ऐ मेरे रसूल!) अगर वे इस क़ुरआन-ए-करीम पर ईमान न लाएँ, तो क्या तुम ग़म और ग़ुस्से से उनके पीछे अपनी जान हलाक कर दोगे! हमने ज़मीन पर जो कुछ है (जंगल, नदियाँ, खानें, जानवर और पौधे…), उसे ज़ीनत बनाया, ताकि आज़माएँ कि लोगों में किसका अमल नेक है…”16
“सज्दा सिर्फ़ अल्लाह तआला के लिए ख़ास है” हदीस शरीफ़
नज्जाशी ख़ुद को रोक न सके और बोले: “अल्लाह की क़सम, यह उसी एक क़िंदील से फूटने वाला नूर है। मूसा और ईसा (अलैहिमस्सलाम) भी इसी को लेकर आए थे।” फिर क़ुरैश के सफ़ीरों की तरफ़ मुड़कर कहा: “जाओ! अल्लाह की क़सम, मैं न तो इन्हें तुम्हारे हवाले करूँगा और न इनके बारे में कोई बुराई सोचूँगा।” अब्दुल्लाह इब्ने अबी रबीआ और अम्र इब्ने आस नज्जाशी के दरबार से निकल आए।17 अम्र ने अब्दुल्लाह से कहा: “क़सम खाता हूँ, मैं नज्जाशी के सामने इनका एक क़ुसूर ज़ाहिर करके इनकी जड़ उखड़वा दूँगा, फिर देखना!” उसके साथी ने अम्र से कहा: “ये हमारी मुख़ालफ़त करते हैं, फिर भी भले-बुरे जैसे भी हों, हमारे रिश्तेदार हैं। ऐसा न करो।” अम्र ने कहा: “मैं नज्जाशी को ख़बर दूँगा कि ये ईसा अलैहिस्सलाम को एक बंदा मानते हैं।” अगले दिन उसने नज्जाशी के पास जाकर कहा: “ऐ बादशाह! ये लोग मरयम के बेटे ईसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में सख़्त बातें कहते हैं। इनके पास आदमी भेजकर ज़रा पूछिए तो कि ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में ये क्या कहते हैं।” नज्जाशी ने हज़रत ईसा के बारे में उनका अक़ीदा पूछने के लिए मुसलमानों के पास आदमी भेजा। मुसलमान फिर इकट्ठा हुए। उन्होंने आपस में कहा: “अगर ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में पूछें तो हम क्या जवाब देंगे?” हज़रत जाफ़र ने कहा: “अल्लाह की क़सम, हज़रत ईसा के बारे में हम वही कहेंगे जो अल्लाह तआला ने फ़रमाया है और जो नबी-ए-करीम हमारे पास लेकर आए हैं।” जब वे नज्जाशी के दरबार में हाज़िर हुए तो नज्जाशी ने पूछा: “तुम मरयम के बेटे ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में क्या कहते हो?” हज़रत जाफ़र ने कहा: “हम ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में वही कहते हैं जो नबी-ए-करीम अल्लाह तआला की तरफ़ से हमारे पास लाए और हम तक पहुँचाया। हम मानते हैं कि वह अल्लाह तआला के बंदे और रसूल हैं, और अल्लाह तआला का वह कलिमा हैं जो उसने पाकदामन ख़ातून हज़रत मरयम पर डाला, जिन्होंने दुनिया और मर्दों से मुँह मोड़कर हक़ तआला से लौ लगा रखी थी। मरयम के बेटे ईसा का हाल और उनकी शान बस यही है। हम कहते हैं कि जिस तरह अल्लाह तआला ने हज़रत आदम को मिट्टी से पैदा किया, उसी तरह ईसा अलैहिस्सलाम को भी बिना बाप के पैदा किया।” यह सुनकर नज्जाशी ने ज़मीन की तरफ़ हाथ बढ़ाया, ज़मीन से घास का एक तिनका उठाया और कहा: “क़सम खाता हूँ, मरयम के बेटे ईसा भी उससे ज़्यादा कुछ नहीं जो तुमने कहा। दोनों में इस तिनके जितना भी फ़र्क़ नहीं।”
नज्जाशी ने जब यह कहा तो उनके आस-पास बैठे सल्तनत के बड़े ओहदेदार और सिपहसालार आपस में खुसर-फुसर करने और बड़बड़ाने लगे।
यह देखकर नज्जाशी ने उनसे कहा: “क़सम खाता हूँ, तुम कुछ भी कहो, मैं इनके बारे में अच्छा ही सोचता हूँ।” फिर मुसलमान मुहाजिरों की तरफ़ मुड़कर यूँ कहा: “मैं तुम्हें और उस हस्ती को मुबारकबाद देता हूँ जिनके पास से तुम आए हो! मुझे यक़ीन हो गया है कि वह अल्लाह के रसूल हैं। हम तो उन्हें इंजील में देख चुके थे। उस रसूल की ख़बर मरयम के बेटे ईसा ने भी दी थी। अल्लाह की क़सम, अगर वह यहाँ होते तो मैं जाकर उनकी जूतियाँ उठाता और उनके पाँव धोता! जाओ! मेरे मुल्क के उस हिस्से में, जहाँ किसी का हाथ नहीं पहुँचा, हर तरह की ज़्यादती से दूर, अमन और सुकून के साथ रहो। जो तुम्हारे साथ बुराई करेगा, मैं उसे हलाक कर दूँगा। अगर मुझे पहाड़ के बराबर सोना भी दें, तब भी मैं तुम में से किसी एक को भी दुख नहीं पहुँचाऊँगा!”
फिर नज्जाशी ने क़ुरैश के सफ़ीरों के लाए हुए तोहफ़ों के बारे में कहा: “मुझे इनकी कोई ज़रूरत नहीं! जब अल्लाह तआला ने दूसरों की छीनी हुई मेरी यह सल्तनत मुझे लौटाई और लोगों को मेरा फ़रमाँबरदार बनाया, तब उसने मुझसे रिश्वत नहीं ली थी।” यह कहकर उन्होंने तोहफ़े लौटा दिए। क़ुरैश के सफ़ीर नज्जाशी के दरबार से ख़ाली हाथ लौटे। ख़ुशनसीब नज्जाशी ने इस्लाम को चुन लिया था और सहाबा-ए-किराम को बेहद ख़ुश कर दिया था।18
हक़ ने पैदा किया आलम
हक़ ने आलम को पैदा किया मुहम्मद के इश्क़ में,
चाँद और सूरज को बनाया मुहम्मद के शौक़ में।
“हो जा!” कहा तो आलम हुआ, लिखे गए लौह-ओ-क़लम,
पढ़ा गया ख़त्म-ए-कलाम मुहम्मद की शान में।
सारे औलिया आए, दरगाह पे चेहरे मले,
तौहीद का ज़िक्र किया मुहम्मद के नूर के लिए।
उवैस क़रनी ने पाया, फिर भी तमन्ना रही,
आठों जन्नतें सजीं मुहम्मद के इश्क़ में।
हवा में उड़ें परिंदे, हरे हों पहाड़ और पत्थर,
फल देते हैं दरख़्त मुहम्मद के इश्क़ में।
ईमान से ख़ाली आए, आपसे ईमान पाया,
पाँच वक़्त नमाज़ पढ़ी मुहम्मद के इश्क़ में।
फ़रिश्ते आए और सफ़-ब-सफ़ खड़े हो गए,
पाँच वक़्त नमाज़ पढ़ी मुहम्मद के इश्क़ में।
यूनुस क्या तारीफ़ करे, क़ुरआन की आयत करती है,
याद कर, दुरूद पढ़ मुहम्मद के इश्क़ में।
“मैं तुम्हें और उस हस्ती को मुबारकबाद देता हूँ जिनके पास से तुम आए हो! मुझे यक़ीन हो गया है कि वह अल्लाह के रसूल हैं। हम तो उन्हें इंजील में देख चुके थे। उस रसूल की ख़बर मरयम के बेटे ईसा ने भी दी थी” नज्जाशी असहमा
