मेरे प्यारे नबी

उमरतुल क़ज़ा का सफ़र

हुदैबिया की सुलह को एक साल गुज़र चुका था। ईदुल अज़हा से एक महीना पहले, ज़िलक़ादा महीने के शुरू में रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सहाबा-ए-किराम को उमरे की तैयारी का हुक्म दिया। उमरे में उन सब लोगों को शामिल होना था जो हुदैबिया गए थे और बैअत-ए-रिज़वान में शरीक हुए थे, सिवाय उनके जिनका इंतिक़ाल हो चुका था। इस हुक्म पर दो हज़ार सहाबा ने अपनी तैयारियाँ पूरी कीं। क़ुरबानी के लिए सत्तर ऊँट लिए गए। इन्हें चराते हुए मक्का तक ले जाने का काम नाजिया इब्ने जुंदुब और उनके चार साथियों को सौंपा गया। इसके अलावा हज़रत मुहम्मद इब्ने मस्लमा के मातहत सौ घुड़सवार देकर उन्हें जंग में काम आने वाले ज़िरह, नेज़े, तलवार जैसे हथियार ले जाने के लिए आगे भेजा गया। मुशरिकों पर भरोसा नहीं किया जा सकता था। किसी हमले की सूरत में इन हथियारों से काम लिया जाता। सहाबा-ए-किराम में से कुछ ने कहा: “या रसूलल्लाह! हुदैबिया की सुलह के मुताबिक़ तो हमें उमरे के लिए म्यान में रखी तलवारों के सिवा किसी हथियार के साथ नहीं आना था!” सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “हम ये हथियार हरम में, क़ुरैश के पास नहीं ले जाएँगे। लेकिन क़ुरैश की तरफ़ से हम पर कोई हमला हो, तो उसके मुक़ाबले के लिए ये हमारे क़रीब, हमारे हाथ के नीचे रहेंगे।”

मदीना मुनव्वरा में नायब के तौर पर अबू ज़र ग़िफ़ारी को छोड़ा गया।1 अबू रुह्म ग़िफ़ारी के छोड़े जाने की भी रिवायत है। दो हज़ार सहाबा हमारे प्यारे नबी के साथ मक्का की तरफ़ रवाना हुए। सहाबा-ए-किराम बहुत जोश में थे। बरसों पहले अल्लाह तआला की राह में, हमारे प्यारे नबी की ख़ातिर जो घर, जो चूल्हे, जो वतन उन्होंने छोड़ दिए थे, अब वे उन्हें देखने वाले थे… पाँचों वक़्त की नमाज़ में जिसकी तरफ़ रुख़ करते थे, उस काबा मुअज़्ज़मा की ज़ियारत करने वाले थे… अपने उन रिश्तेदारों से मिलने वाले थे जो मुसलमान तो हो चुके थे, मगर समझौते की वजह से मदीना न आ सके थे। बरसों तक जिन्होंने उनकी आँखों से आँसुओं की जगह ख़ून बहाया, उन्हें ज़ुल्म के नीचे कराहने पर मजबूर किया और अपने बुतों को पुजवाने के लिए उनके बहुत-से भाइयों को शहीद किया, उन क़ुरैशी मुशरिकों को वे इस्लाम की आबरू और शान दिखाने वाले थे। शायद यह देखकर मुशरिकों के दिल में इस्लाम की मुहब्बत पैदा हो जाए और वे मुसलमान हो जाएँ!…

मदीना में रह जाने वाले लोग सारे जहानों के सरदार को सनिय्यतुल वदा तक तकबीरों के साथ रुख़सत करके लौट आए… हमारे प्यारे नबी मदीना से लगभग दस किलोमीटर दूर ज़ुल हुलैफ़ा पहुँचे, तो आपने एहराम बाँधा। शान वाले सहाबा ने भी आपकी पैरवी की। हर कोई सफ़ेद लिबास में लिपटा हुआ था। उमरा करने के लिए मक्का मुकर्रमा का सफ़र शुरू हो चुका था। अब “लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक! लब्बैक, ला शरीक लक लब्बैक! इन्नल हम्द वन्निअमत लक वल मुल्क, ला शरीक लक!” (हाज़िर हूँ, या अल्लाह, हाज़िर हूँ! तेरी पुकार का मैंने अपनी बात और अपनी जान से बार-बार जवाब दिया, तेरे हुक्म के आगे सिर झुकाया। तेरा कोई शरीक नहीं, मैं अपने पूरे वुजूद के साथ तेरी तरफ़ मुतवज्जह हुआ। हम्द और नेमत तेरे ही लिए ख़ास हैं। मुल्क भी तेरा ही है। तेरा कोई साझी नहीं) की सदाओं से ज़मीन और आसमान गूँज रहे थे।

सहाबा अल्लाह तआला की हम्द करते, उससे गिड़गिड़ाकर दुआ करते और उसके मुबारक नाम का ज़िक्र करते जा रहे थे, और सफ़र बड़े लुत्फ़ से गुज़र रहा था।

मुहम्मद इब्ने मस्लमा की सरबराही में आगे जाने वाला दस्ता मक्का के क़रीब पहुँचा तो क़ुरैशी मुशरिकों ने उसे देख लिया। वे डरते-डरते क़रीब आए, गोया कह रहे हों कि क्या एक साल पहले हमारा यही समझौता हुआ था, और पूछा: “यह क्या है?” मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने उन्हें ऐसा जवाब दिया जिससे उनकी हड्डियों का गूदा जम गया: “ये अल्लाह तआला के रसूल के घुड़सवार हैं… अल्लाह तआला ने चाहा, तो कल वह भी यहाँ तशरीफ़ ले आएँगे!…” मुशरिक डरते-डरते लौटे और यह ख़बर मक्का पहुँचाई। मक्का के मुशरिक कहने लगे: “हम क़सम खाते हैं, हम समझौते पर क़ायम रहे। मुहम्मद हमसे क्यों लड़े?…” उन्होंने फ़ौरन अपने बीच से कुछ लोगों का एक वफ़्द नबी-ए-करीम से बात करने के लिए भेजा।

“लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक! लब्बैक, ला शरीक लक लब्बैक! इन्नल हम्द वन्निअमत लक वल मुल्क, ला शरीक लक!” तल्बिया

इस बीच सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बत्न-ए-याजूज नाम की उस जगह पहुँच चुके थे जहाँ से मक्का दिखाई देता था। यहाँ आपने कमर में लटकी तलवारों के सिवा अपने तमाम हथियार छोड़ दिए। हथियारों की निगरानी के लिए दो सौ सहाबा को पहरे पर मुक़र्रर किया। ये तैयारियाँ पूरी हुईं तो क़ुरैश के वफ़्द ने नबी-ए-करीम से बात करने और आपकी ख़िदमत में हाज़िर होने की इजाज़त माँगी। इजाज़त मिलने पर उन्होंने कहा: “ऐ मुहम्मद! हुदैबिया के समझौते के बाद से हमने तुम्हारे साथ कोई ग़द्दारी नहीं की। फिर भी क्या तुम मक्का में, अपनी क़ौम के पास इन हथियारों के साथ दाख़िल होगे? हालाँकि हमारे समझौते के मुताबिक़ तुम्हारे पास म्यान में रखी तलवारों के सिवा कुछ नहीं होना था!…” इस पर सारे जहानों के सरदार ने यूँ जवाब दिया: “मैं बचपन से आज तक अपने क़ौल पर क़ायम रहने और अपनी वफ़ादारी के लिए जाना जाता हूँ। हम हरम में म्यान में रखी अपनी तलवारों के सिवा किसी हथियार के साथ दाख़िल होने वाले नहीं। लेकिन मैं चाहता हूँ कि हथियार मेरे क़रीब किसी जगह रहें।” वफ़्द समझ गया कि उन तक पहुँची ख़बर कुछ और थी, और उन्हें इत्मीनान हो गया। उन्होंने कहा: “ऐ मुहम्मद! सच तो यह है कि हमने तुमसे हमेशा वफ़ादारी और भलाई ही देखी है। तुम्हें यही ज़ेब देता है।” और लौट गए। मक्का आकर उन्होंने क़ुरैश को हाल बताया। उन्हें भी इत्मीनान हो गया।

क़ुरैश के बड़े लोग कीने और हसद की वजह से नबी-ए-करीम और आपके सहाबा के ये ख़ुशी के लम्हे न देखने के लिए मक्का छोड़कर पहाड़ों पर चढ़ गए। हमारे प्यारे नबी ने निशान लगे क़ुरबानी के ऊँटों को ज़ी तुवा नाम की जगह पर आगे भेज दिया। फिर अपने सहाबा के साथ तैयारियाँ पूरी करके मुक़द्दस शहर मक्का में दाख़िल होने के लिए चल पड़े। सहाबा-ए-किराम ने सारे जहानों के सरदार को अपने बीच में ले रखा था। कायनात के सुल्तान अपनी ऊँटनी क़सवा पर, हज़ारों सितारों के वुजूद को ढक लेने वाले सूरज की तरह, अपने चारों तरफ़ नूर बिखेर रहे थे। या रब! कैसी ख़ूबसूरती! कैसा शानदार मंज़र था वह!…

ज़बानों पर “लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक! लब्बैक, ला शरीक लक लब्बैक!…” की सदाएँ थीं, और दिलों में अल्लाह तआला और उसके रसूल की मुहब्बत।

वे क़दम-ब-क़दम अज़ीम काबा की तरफ़ बढ़ रहे थे। जितना क़रीब होते, उनका जोश और बढ़ता जाता, मानो उमड़ा पड़ रहा हो। एक ज़बान होकर पुकारी जाने वाली तल्बिया की सदाएँ मक्का में भर रही थीं; मुशरिक इस शानदार मंज़र को जितना देखते, उनके अंदर कुछ पिघलता जाता, और वे महसूस करते कि उनके दिलों में मुहब्बत का एक गुनगुना शरबत उतर रहा है। बहुतों के दिल में तो इस्लाम की मुहब्बत पैदा हो भी चुकी थी… आख़िरकार कायनात के सुल्तान, दोनों जहान के सरदार, हमारे प्यारे, इज़्ज़त वाले नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ग़ालिब आ गए थे…

अब हमारे प्यारे नबी और आपके शान वाले सहाबा कमर में तलवारें लटकाए काबा मुअज़्ज़मा में दाख़िल हो रहे थे। नबी-ए-करीम की ऊँटनी क़सवा की नकेल हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा थामे आगे-आगे चल रहे थे। मक्का के कुछ मुशरिक अपनी औरतों और बच्चों के साथ दारुन नदवा में क़तार बाँधे हमारे प्यारे नबी और आपके बहादुर सहाबा को देख रहे थे। अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा आगे बढ़ते हुए शेर पढ़ने लगे, और उनके शेर मुशरिकों के सिर पर हथौड़े की तरह पड़ते और उनके दिलों तक उतर जाते थे:

ऐ काफ़िरो, हट जाओ नबी की राह से,
अल्लाह तआला ने उन पर उतारा है क़ुरआन।
हर ख़ैर और हर भलाई है उनके दीन में,
इस दीन के लिए मरना ही सबसे अच्छी मौत है।
वह सच्चे रसूलुल्लाह हैं, मैंने दिल से माना,
उनकी हर बात पर ईमान लाया, अब क़बूल किया मैंने।
ऐ काफ़िरो! जब तुमने क़ुरआन के अल्लाह तआला की तरफ़ से
उतरने का इंकार किया था,
तो किस तरह अचानक हमने तुम पर वार किए थे,
और किस तरह तुम्हारे सिर धड़ से अलग किए थे।
अगर तुम उसके मायने पर भी ईमान न लाओ,
तो इसी तरह तुम्हारे सिरों पर वार पड़ेंगे।
शुरू करता हूँ उस अल्लाह के मुबारक नाम से,
जिसके दीन के सिवा कोई सच्चा दीन नहीं।
और फिर शुरू करता हूँ उस अल्लाह के नाम से,
मुहम्मद उसके बंदे भी हैं और रसूल भी।

हज़रत उमर से रहा न गया और उन्होंने उन्हें टोकना चाहा: “ऐ इब्ने रवाहा! तुम रसूलुल्लाह के सामने और हरम शरीफ़ में शेर कैसे पढ़ सकते हो?” लेकिन नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ उमर! इन्हें मत रोको! अल्लाह तआला की क़सम, इनकी बातें इन क़ुरैशी मुशरिकों पर तीर बरसाने से भी ज़्यादा जल्दी और ज़्यादा असर करती हैं। ऐ इब्ने रवाहा, जारी रखो!”

कुछ देर बाद नबी-ए-करीम ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा से फ़रमाया: “कहो: ‘अल्लाह तआला के सिवा कोई माबूद नहीं! वह एक है! अपना वादा पूरा करने वाला वही है! अपने इस बंदे की मदद करने वाला वही है! अपने लश्करों को ताक़त देने वाला वही है! जमा होकर आए क़बीलों को शिकस्त देने वाला भी सिर्फ़ वही है!’”

इसके बाद अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा यूँ पढ़ने लगे:

अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं माबूद!
उसका कोई शरीक नहीं, ला इलाह इल्लल्लाह!
मुसलमानों के लश्कर को ताक़त देने वाला वही!
और काफ़िरों को तितर-बितर कर हराने वाला वही!

मुसलमान भी ये बातें दोहरा रहे थे। हमारे प्यारे नबी बैतुल्लाह में दाख़िल हुए तो अपना मुबारक दायाँ कंधा खोल दिया। आपके मुबारक जिस्म की ख़ूबसूरती आँखों को चकाचौंध कर रही थी, दिलों को अपनी तरफ़ खींच रही थी, सूरज की तरह नूर बिखेर रही थी। फिर आपने फ़रमाया: “अल्लाह तआला उन बहादुरों की अपनी रहमत से मग़फ़िरत फ़रमाए जो आज इन मुशरिकों के सामने अपने आपको ताक़तवर और चुस्त दिखाएँगे!” इस पर सहाबा-ए-किराम ने अपने दाएँ कंधे खोले और रोब के साथ तेज़-तेज़ चलते हुए काबा का तीन बार तवाफ़ किया। अलबत्ता रुक्न-ए-यमानी और हजर-ए-असवद वाले कोने के बीच धीरे-धीरे चले। नबी-ए-करीम और आपके सहाबा हजर-ए-असवद के क़रीब आकर उसे चूमते, या दूर से अपने हाथ उठाकर हजर-ए-असवद की तरफ़ करते।

“अल्लाह तआला की क़सम, इनकी (इब्ने रवाहा की) बातें इन क़ुरैशी मुशरिकों पर तीर बरसाने से भी ज़्यादा जल्दी और ज़्यादा असर करती हैं” हदीस शरीफ़

मुशरिक दूर से सहाबा को देख रहे थे और उनकी इस रोबदार, शानदार चाल पर हैरान हो रहे थे, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि मुसलमान मदीना जाने के बाद से कमज़ोर और बीमार पड़ गए हैं, और ऐसी ही ख़बरें फैलाई गई थीं। अब वे इसका बिल्कुल उल्टा देख रहे थे, और उनकी हैरत बढ़ती जा रही थी।

बाक़ी चार चक्कर धीमे, ठहरे हुए क़दमों से पूरे किए गए। तवाफ़ के बाद उन्होंने मक़ाम-ए-इब्राहीम पर दो रकअत नमाज़ पढ़ी। फिर सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों के बीच सात बार सई की। क़ुरबानियाँ ज़बह हो जाने के बाद नबी-ए-करीम ने अपना मुबारक सिर मुंडवाया। आपके मुबारक बाल हवा में ही लपक लिए गए। सहाबा-ए-किराम ने भी सिर मुंडवाए। इस तरह रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का ठीक एक साल पहले देखा हुआ ख़्वाब पूरा हो गया। उमरे की ज़ियारत पूरी हुई, और ज़ुहर का वक़्त आ गया। सारे जहानों के सरदार ने हज़रत बिलाल को काबा में अज़ान देने का हुक्म दिया, तो बिलाल हब्शी ने फ़ौरन हुक्म की तामील की। जब वह काबा में अज़ान-ए-मुहम्मदी दे रहे थे, तो सारा मक्का हिल उठा। सहाबा-ए-किराम बड़े ख़ुशू के साथ अज़ान सुन रहे थे और धीमी आवाज़ में उसे दोहरा रहे थे। अज़ान ख़त्म हुई तो हबीबुल्लाह इमाम बने। सबके साथ मिलकर पढ़ी गई ज़ुहर की नमाज़ का मुशरिकों के दिलों पर असर कुछ और ही था।

हमारे प्यारे नबी के लिए अबतह में चमड़े का एक ख़ेमा लगाया गया था। सहाबा भी उसके आस-पास के ख़ेमों में तीन दिन ठहरे। नमाज़ के वक़्तों में वे बैतुल्लाह में जमा होते और जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ते थे। बाक़ी वक़्तों में अपने रिश्तेदारों से मिलते और इस्लाम के बख़्शे हुए अच्छे अख़लाक़ से उनके लिए नमूना बनते थे। वे लोग भी सहाबा के इन अच्छे हालात के सामने मानो पिघल जाते और अपनी पसंदीदगी छिपा न पाते। इन तीन दिनों में मानो मक्का अंदर से फ़तह हो चुका था।

तीन दिन पूरे हो गए… अब जुदाई का वक़्त आ गया। शाम के क़रीब नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मुसलमानों में से (उमरे के लिए आने वालों में से) कोई भी शाम मक्का में नहीं गुज़ारेगा, सब रवाना हो जाएँगे!” तो हर एक ने अपना सामान समेटा और मदीना की तरफ़ रवाना हो गया… जुहफ़ा में थे तो रसूलुल्लाह की मुलाक़ात हज़रत अब्बास से हुई, और हज़रत अब्बास ने यह पेशकश की: “या रसूलल्लाह! मैमूना बिन्ते हारिस बेवा हो गई हैं। अगर आप उन्हें अपने निकाह में ले लें, तो कैसा हो?” इस पर नबी-ए-करीम ने अबू राफ़े और अन्सार में से एक साहब को रिश्ते का पैग़ाम देकर मक्का भेजा। हज़रत मैमूना को रसूलुल्लाह की तरफ़ से निकाह के पैग़ाम की ख़बर उस वक़्त मिली जब वह ऊँट पर सवार थीं, तो उन्होंने कहा: “ऊँट भी और जो उस पर है वह भी, रसूलुल्लाह का है।” उन्होंने अपने आपको नबी-ए-करीम को हिबा कर दिया। इस मामले की ज़रूरी कार्रवाई उन्होंने अपनी बड़ी बहन उम्मुल फ़ज़्ल के सुपुर्द की, और उन्होंने इसे अपने शौहर हज़रत अब्बास के सुपुर्द कर दिया। उमरे से मदीना लौटते हुए सरिफ़ नाम की जगह पर पहुँचे, तो हज़रत अब्बास ने हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से चार सौ दिरहम महर लेकर हज़रत मैमूना का निकाह रसूलुल्लाह से कर दिया। शादी भी वहीं हुई। हज़रत मैमूना रसूलुल्लाह के निकाह से मुशर्रफ़ होकर आपकी आख़िरी बीवी बनीं। इसके बाद हमारे नबी ने फिर कोई निकाह नहीं किया।

“अल्लाह तआला उन बहादुरों की अपनी रहमत से मग़फ़िरत फ़रमाए जो आज इन मुशरिकों के सामने अपने आपको ताक़तवर और चुस्त दिखाएँगे!” हदीस शरीफ़

शमादान तोहफ़े में भेजने की जुरअत की है, या रसूलल्लाह!
मेरी मुराद है आपकी बुलंद चौखट की ख़िदमत, या रसूलल्लाह!
रौज़े के लायक़ नहीं मेरा यह हक़ीर तोहफ़ा,
क़बूल फ़रमाइए, एहसान और इनायत कीजिए, या रसूलल्लाह!
आपके सिवा कौन है मेरा, जिससे अपना हाल कहूँ?
आप ही की बारगाह से है एहसान और मुरव्वत, या रसूलल्लाह!
पनाह, अमान, सौ बार अमान, आपके दर पर आ गिरा हूँ,
रहम फ़रमाइए, मेरी शफ़ाअत कीजिए, या रसूलल्लाह!
दोनों जहान में अपने साये में रखिए इंसाफ़ वाले महमूद ख़ान को,
अव्वल भी और आख़िर भी दौलत आप ही की है, या रसूलल्लाह!
II. Mahmud Hân

ख़ालिद इब्ने वलीद का मुसलमान होना

सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब उमरे के लिए मक्का तशरीफ़ ले गए थे, तो आपने अपने सहाबा में से हज़रत वलीद इब्ने वलीद से फ़रमाया था: “ख़ालिद कहाँ है? उस जैसे आदमी का इस्लाम को न पहचानना, न जानना मुमकिन नहीं। काश वह अपनी सारी कोशिश और बहादुरी मुसलमानों के साथ रहकर मुशरिकों के ख़िलाफ़ दिखाता, तो कितना अच्छा होता! हम उससे मुहब्बत करते, उसे बढ़कर मानते।” वलीद इब्ने वलीद इससे पहले भी अपने बड़े भाई को कभी-कभी ख़त लिखकर मुसलमान होने के लिए उभारते रहते थे। जब उन्होंने नबी-ए-करीम की ये मुबारक बातें भी पहुँचा दीं, तो ख़ालिद इब्ने वलीद का इस्लाम की तरफ़ झुकाव दिन-ब-दिन बढ़ता गया। उमरा करने वाले सहाबा मदीना लौट आए। दिन गुज़रते गए, हिजरत का आठवाँ साल शुरू हो गया। ख़ालिद इब्ने वलीद अब अपनी जगह टिक न पाता था; वह तड़प रहा था कि जल्द से जल्द मदीना पहुँचे, सारे जहानों के सरदार की ख़िदमत में घुटने टेककर मुसलमान होने का शरफ़ हासिल करे। वह ख़ुद यूँ बयान करते हैं:

“अल्लाह तआला ने मुझे नबी-ए-करीम की मुहब्बत नसीब फ़रमाई। मेरे दिल में इस्लाम की मुहब्बत बिठा दी। मुझे इस हाल में कर दिया कि मैं भलाई और बुराई में फ़र्क़ कर सकूँ। मैंने अपने दिल में कहा: ‘मैं मुहम्मद अलैहिस्सलाम के ख़िलाफ़ तमाम जंगों में शरीक रहा। लेकिन हर जंग का मैदान छोड़ते वक़्त मैं जानता था कि मैं बिगड़ी हुई और ग़लत राह पर हूँ और आप एक दिन ज़रूर हम पर ग़ालिब आएँगे, और इन्हीं एहसासात के साथ लौटता था।’ रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब हुदैबिया आए थे, तब भी मैं दुश्मन के घुड़सवारों का सरदार था। उस्फ़ान में मैं उनके क़रीब पहुँचकर सामने आया। रसूलुल्लाह हमसे बेफ़िक्र होकर अपने सहाबा को ज़ुहर की नमाज़ पढ़ा रहे थे। हमने उन पर अचानक हमला करना चाहा, मगर यह मुमकिन न हुआ। ऐसा होना भी अच्छा ही हुआ। रसूलुल्लाह ने शायद हमारे दिलों की बात समझ ली थी, क्योंकि अस्र की नमाज़ आपने एहतियात के साथ पढ़ी। इस बात ने मुझ पर बहुत असर किया। मैंने कहा कि इस हस्ती की ज़रूर अल्लाह हिफ़ाज़त कर रहा है। हम एक-दूसरे से अलग हो गए। मैं तरह-तरह के ख़यालों में था कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम उमरे के लिए मक्का तशरीफ़ लाए, लेकिन मैं आपके सामने न आया। मेरे भाई वलीद आपके साथ आए थे, मगर उन्होंने मुझे न पाया। मेरे भाई ने यह ख़त छोड़ा था: ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम! अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना और रसूलुल्लाह पर दुरूद-ओ-सलाम के बाद कहता हूँ: सच तो यह है कि तुम्हारे इस्लाम से मुँह मोड़कर चले जाने से ज़्यादा हैरत की कोई बात मैं नहीं जानता। तुम तो ऐसे आदमी हो जो अपनी राह का ग़लत होना समझ सकता है। अपनी अक़्ल से काम क्यों नहीं लेते? इस्लाम जैसे दीन को पहचान-समझ न पाना कितनी अजीब बात है! नबी-ए-करीम ने मुझसे तुम्हारे बारे में पूछा। वह चाहते हैं कि तुम इस्लाम को पहचानो और अपनी कोशिश और बहादुरी मुसलमानों के बीच रहकर मुशरिकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करो। ऐ मेरे भाई! तुमने बहुत-से मौक़े गँवा दिए; अब और देर न करो!’

मेरे भाई का ख़त मुझ तक पहुँचा, तो मुझमें मुसलमान होने की ख़्वाहिश बहुत बढ़ गई। मैं जाने की जल्दी में था। रसूलुल्लाह की कही बातों ने मुझे बहुत ख़ुश कर दिया था। उस रात सोते हुए मैंने ख़्वाब में देखा कि मैं तंग, घुटन भरी और रेगिस्तान जैसी बे-पानी जगहों से निकलकर हरी-भरी, चौड़ी और खुली जगह में आ गया हूँ। मैंने तय किया कि मदीना पहुँचकर यह ख़्वाब हज़रत अबू बकर को सुनाऊँगा और उनसे इसकी ताबीर पूछूँगा। मैं रसूलुल्लाह के पास जाने की तैयारी कर रहा था, तो सोचने लगा: ‘भला वहाँ जाते हुए मेरा साथी कौन बन सकता है?’ उसी वक़्त सफ़वान इब्ने उमय्या मिल गए। मैंने उन्हें सारी बात बताई। उन्होंने मेरी पेशकश ठुकरा दी। फिर इकरिमा इब्ने अबी जहल मिले। उन्होंने भी इंकार कर दिया, तो मैं अपने घर चला गया। अपनी सवारी पर बैठकर उस्मान इब्ने तल्हा के पास गया। उनसे भी कहा कि मैं मुसलमान होने के लिए रसूलुल्लाह के पास जा रहा हूँ, और उनसे साथ चलने को कहा। वह बिना झिझक राज़ी हो गए, और अगले दिन सहरी के वक़्त हम साथ रवाना हुए। हिरा नाम की जगह पर पहुँचे, तो अम्र इब्ने आस से मुलाक़ात हुई। उन्होंने हमसे पूछा कि हम कहाँ जा रहे हैं। हमने अपना मक़सद बताया, तो उन्होंने भी बताया कि वह हब्शा के मुल्क से आ रहे हैं, नज्जाशी असहमा के पास मुसलमान हो चुके हैं और रसूलुल्लाह से बैअत करने मदीना जा रहे हैं। हम तीनों मदीना पहुँचे। नबी-ए-करीम को हमारे आने की ख़बर हुई तो आपने फ़रमाया: ‘मक्का ने अपने जिगर के टुकड़े हमारी तरफ़ फेंक दिए।’ मदीना पहुँचकर मैंने सफ़र के कपड़े उतारे। अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर रसूलुल्लाह से मिलने की तैयारी की। इतने में मेरे भाई वलीद आए और कहा: ‘जल्दी करो, नबी-ए-करीम को तुम्हारे आने की ख़बर दे दी गई है, और आप बहुत ख़ुश हुए हैं। अब वह तुम्हारा इंतिज़ार कर रहे हैं।’ मैं जल्दी-जल्दी उस बुलंद नबी की ख़िदमत में पहुँचा। आप मुस्कुरा रहे थे। मैंने सलाम किया और कहा: ‘मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा कोई माबूद नहीं और आप अल्लाह तआला के नबी हैं।’ आपने फ़रमाया: ‘उस अल्लाह तआला की हम्द है जिसने तुम्हें हिदायत दी, सीधा रास्ता दिखाया।’ फिर मैंने दरख़्वास्त की कि मेरे गुनाहों की माफ़ी के लिए अल्लाह तआला से दुआ फ़रमाएँ। आपने मेरे लिए दुआ फ़रमाई और फ़रमाया: ‘इस्लाम अपने से पहले किए गए गुनाहों को काट फेंकता है।’ मेरे दोनों साथी भी मुसलमान हो गए।”2 ये तीनों मक्का के सबसे बहादुर सूरमा थे; वे जान की परवाह न करते थे और अपने मक़सद की राह में जान देने से ज़र्रा भर न झिझकते थे। अब दिलों से उमड़ते इख़लास के साथ वे रसूल-ए-अकरम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और सहाबा-ए-किराम में शामिल होने के शरफ़ से नवाज़े गए। अब वे अपनी पूरी ताक़त से कुफ़्र को मिटाने की कोशिश करने वाले थे। उनके मुसलमान होने पर सहाबा बहुत ख़ुश हुए और अपनी ख़ुशी का इज़हार “अल्लाहु अकबर!” की तकबीरों से किया।

हज़रत मुहम्मद हक़ की आवाज़ हैं,
वह दोनों जहान के सरदार हैं।
अरब हो या अजम, सब उनके ग़ुलाम हैं।
ज़माने ने उस गुल जैसा कोई गुल नहीं देखा,
तू भी उस हसीन के आगे सिर झुका दे।
इमाम बूसीरी

“इस्लाम अपने से पहले किए गए गुनाहों को काट फेंकता है” हदीस शरीफ़