मेरे प्यारे नबी

नबी-ए-करीम की फ़ज़ीलतें

मुहम्मद अलैहिस्सलाम की फ़ज़ीलतें बयान करने वाली सैकड़ों किताबें हैं। फ़ज़ीलत का मतलब है “बरतरी”। आपकी बरतरियों में से कुछ नीचे बयान की गई हैं: 1. मख़लूक़ात में सबसे पहले मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर और रूह पैदा की गई। 2. अल्लाह तआला ने आपका नाम अर्श पर, जन्नतों पर और सातों आसमानों पर लिखा है। 3. हिन्दुस्तान में उगने वाले एक गुलाब की पत्तियों पर “ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” लिखा होता है। 4. बसरा शहर के क़रीब एक नदी में पकड़ी गई मछली के दाहिनी तरफ़ “अल्लाह” और बाईं तरफ़ “मुहम्मद” लिखा हुआ देखा गया। इस तरह के वाक़िआत बहुत हैं। 1975 में लंदन में छपी किताब A History of Fishes के दो सौवें पेज पर एक मछली की तस्वीर है, जिसकी दुम पर क़ुरआन-ए-करीम के हुरूफ़ में “शानुल्लाह” लिखा है। दी गई जानकारी में बताया गया है कि दुम की दूसरी तरफ़ “ला इलाह इल्लल्लाह” लिखा हुआ है। इसकी मिसालें बहुत हैं। 5. ऐसे फ़रिश्ते हैं जिनका मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नाम लेने के सिवा कोई काम नहीं। 6. फ़रिश्तों को हज़रत आदम को सज्दा करने का हुक्म इसलिए दिया गया था कि उनकी पेशानी में मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर था। 7. अल्लाह तआला ने तमाम नबियों को बताया कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाएँगे, और यह भी कि वे अपनी उम्मतों को हुक्म दें कि अगर वे आपका ज़माना पाएँ, तो आप पर ईमान लाएँ। 8. दुनिया में आपकी तशरीफ़ आवरी के वक़्त बहुत बड़ी निशानियाँ देखी गईं। ये तारीख़ और मौलिद की किताबों में लिखी हुई हैं। 9. जब आप दुनिया में तशरीफ़ लाए, तो आपकी नाल कटी हुई थी और आप ख़तना किए हुए थे। 10. आपके दुनिया में तशरीफ़ लाने पर शैतान आसमान पर चढ़कर फ़रिश्तों से ख़बरें न चुरा सके। 11. आपके दुनिया में तशरीफ़ लाने के वक़्त ज़मीन के तमाम बुत और पूजे जाने वाले मुजस्समे मुँह के बल गिर पड़े। 12. आपका पालना फ़रिश्ते झुलाते थे। 13. पालने में आसमान के चाँद से बातें करते थे। चाँद उस तरफ़ झुक जाता जिधर आप अपनी मुबारक उँगली से इशारा करते। 14. पालने में ही बोलने लगे। 15. बचपन में जब खुले मैदानों में चलते, तो आपके सिर के ऊपर एक बादल भी साथ-साथ चलकर साया करता था। यह हाल नुबुव्वत शुरू होने तक जारी रहा। 16. हर नबी के दाहिने हाथ पर नुबुव्वत की मुहर थी। मुहम्मद अलैहिस्सलाम की मुहर आपकी मुबारक पीठ के बीच, बाएँ कंधे की हड्डी के क़रीब, दिल के ऊपर थी। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने जब आपका दिल धोकर सीना बंद किया, तो जन्नत से लाई हुई मुहर से आपकी पीठ पर मुहर लगाई थी।

17. जिस तरह सामने देखते थे, उसी तरह पीछे भी देखते थे।

18. जिस तरह रौशनी में देखते थे, उसी तरह अँधेरे में भी देखते थे। 19. आपके मुबारक लुआब ने खारे पानी को मीठा कर दिया और बीमारों को शिफ़ा दी; दूध पीते बच्चों के लिए वह दूध जैसी ग़िज़ा बन गया। 20. आँखें सोती थीं, मगर दिल जागता रहता था। (तमाम नबी भी ऐसे ही थे।) 21. उम्र भर कभी जमाही नहीं ली। 22. आपका मुबारक पसीना गुलाब की तरह महकता था। एक ग़रीब शख़्स ने अपनी बेटी की शादी के वक़्त आपसे मदद माँगी थी। उस वक़्त आपके पास देने को कुछ न था। आपने एक छोटी शीशी में अपना पसीना डालकर दे दिया। उस लड़की ने जब उसे अपने चेहरे और सिर पर मला, तो उसका घर मुश्क की तरह महकने लगा। उसका घर “ख़ुशबू वाला घर” के नाम से मशहूर हो गया। 23. दरमियाना क़द के होने के बावजूद लंबे लोगों के पास होते, तो उनसे ऊँचे दिखाई देते थे। 24. सूरज और चाँद की रौशनी में चलते, तो आपका साया ज़मीन पर नहीं पड़ता था। 25. आपके बदन और कपड़ों पर मक्खी, मच्छर और दूसरे कीड़े नहीं बैठते थे। 26. आपके अंदर के कपड़े, चाहे कितने ही दिन पहने जाते, कभी मैले नहीं होते थे। 27. जब भी चलते, आपके पीछे फ़रिश्ते चलते थे। इसीलिए अपने सहाबा को आगे चलाते और फ़रमाते: “मेरे पीछे की जगह फ़रिश्तों के लिए छोड़ दो।”1 28. पत्थर पर क़दम रखते, तो पत्थर पर आपके पाँव का निशान रह जाता था। रेत पर चलते, तो बिल्कुल निशान नहीं छोड़ते थे। जब क़ज़ा-ए-हाजत करते, तो ज़मीन फट जाती और सब कुछ मिट्टी के अंदर चला जाता था। (तमाम नबी भी ऐसे ही थे।) 29. इंसानों और फ़रिश्तों में सबसे ज़्यादा इल्म आपको दिया गया। आप उम्मी थे, यानी किसी से कुछ नहीं सीखा था, फिर भी अल्लाह तआला ने आपको हर चीज़ बता दी। जिस तरह आदम अलैहिस्सलाम को हर चीज़ का नाम बताया गया था, उसी तरह आपको हर चीज़ का नाम और इल्म बताया गया। 30. आपकी उम्मत के नाम, उनकी शक्लें और उनके बीच होने वाली तमाम बातें आपको बता दी गईं। 31. आपकी अक़्ल तमाम इंसानों की अक़्ल से ज़्यादा है। 32. इंसानों में पाई जा सकने वाली तमाम अच्छी आदतें आपको अता की गईं। बड़े शायर उमर इब्नुल फ़ारिज़ से पूछा गया: “आपने रसूलुल्लाह की मदह क्यों नहीं की?” तो उन्होंने कहा: “मैं समझ गया कि रसूलुल्लाह की मदह करने की ताक़त मुझमें नहीं होगी। आपकी मदह के लायक़ लफ़्ज़ मुझे नहीं मिले।”

“मैं इस पर राज़ी नहीं होऊँगा कि मेरी उम्मत में से कोई एक भी जहन्नम में रह जाए” हदीस शरीफ़

33. कलिमा-ए-शहादत में, अज़ान में, इक़ामत में, नमाज़ के तशह्हुद में, बहुत सी दुआओं में, कुछ इबादतों और ख़ुत्बों में, नसीहत करते वक़्त, मुसीबत के वक़्त, क़ब्र में, महशर में, जन्नत में और हर मख़लूक़ की ज़बान पर अल्लाह तआला ने आपका नाम अपने नाम के साथ रखा है। 34. आपकी बरतरियों में सबसे बढ़कर आपका हबीबुल्लाह होना है। अल्लाह तआला ने आपको अपना प्यारा और दोस्त बनाया। आपसे हर एक से, हर फ़रिश्ते से ज़्यादा मुहब्बत की। उसने फ़रमाया: “अगर मैंने इब्राहीम को ख़लील बनाया, तो तुम्हें अपना हबीब बनाया।”

35. “तुम्हारे राज़ी होने तक (‘बस’ कहने तक) मैं तुम्हें हर वह चीज़ दूँगा जो तुम चाहो”2 – इस मफ़हूम वाली आयत-ए-करीमा वादा करती है कि अल्लाह तआला अपने नबी को तमाम इल्म, तमाम बरतरियाँ, इस्लाम के अहकाम, दुश्मनों के मुक़ाबले में मदद और ग़लबा, आपकी उम्मत को फ़तहें और कामयाबियाँ, और क़यामत में हर तरह की शफ़ाअत और तजल्लियाँ अता फ़रमाएगा। जब यह आयत-ए-करीमा उतरी, तो आपने जिबराईल अलैहिस्सलाम की तरफ़ देखकर फ़रमाया: “मैं इस पर राज़ी नहीं होऊँगा कि मेरी उम्मत में से कोई एक भी जहन्नम में रह जाए।” 36. अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-करीम में हर नबी को उनके नाम से पुकारा, मगर मुहम्मद अलैहिस्सलाम को “ऐ मेरे रसूल! ऐ मेरे नबी!” कहकर ख़िताब किया। 37. अरबी ज़बान की हर बोली में बहुत साफ़ और आसानी से समझ में आने वाले अंदाज़ में बात करते थे। अलग-अलग जगहों से आकर सवाल करने वालों को उन्हीं की बोली में जवाब देते थे। सुनने वाले हैरान रह जाते थे। आप फ़रमाते थे: “अल्लाह तआला ने मेरी बहुत अच्छी तरबियत फ़रमाई।”3

38. थोड़े लफ़्ज़ों में बहुत कुछ बयान कर देते थे। आपकी एक लाख से ज़्यादा हदीसें बताती हैं कि आप “जवामिउल कलिम” थे।

कुछ आलिमों ने कहा: “मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने दीन-ए-इस्लाम की चार बुनियादें चार हदीसों से बयान फ़रमाई हैं:

- ‘अमल नीयत के मुताबिक़ परखे जाते हैं।’4

- ‘हलाल ज़ाहिर है, हराम ज़ाहिर है।’5

- ‘दावा करने वाले पर गवाह पेश करना और जिस पर दावा किया गया हो, उस पर क़सम खाना लाज़िम है।’6 और

- ‘कोई शख़्स जब तक अपने दीनी भाई के लिए भी वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है, उसका ईमान कामिल नहीं होता।’7 इन चार हदीसों में से पहली इबादत की, दूसरी मुआमलात की, तीसरी ख़ुसूमात, यानी इंसाफ़ के कामों और सियासत की, और चौथी आदाब और अख़लाक़ के इल्म की बुनियाद है।”8

39. मुहम्मद अलैहिस्सलाम मसून (महफ़ूज़) और मासूम (बेगुनाह) थे। जान-बूझकर या अनजाने में, बड़ा या छोटा, चालीस साल की उम्र से पहले या बाद, आपने कोई गुनाह नहीं किया। आपकी कोई भी बुरी हरकत नहीं देखी गई। 40. मुसलमानों को हुक्म दिया गया कि नमाज़ में बैठते वक़्त “अस्सलामु अलैका अय्युहन नबिय्यु व रहमतुल्लाहि” पढ़कर मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर सलाम भेजें। नमाज़ में किसी और नबी या फ़रिश्तों पर सलाम भेजना जाइज़ नहीं हुआ। 41. हदीस-ए-क़ुदसी में फ़रमाया गया: “अगर तुम न होते, तो मैं कोई चीज़ पैदा न करता!”9

42. दूसरे नबियों ने काफ़िरों के बोहतानों का जवाब ख़ुद दिया। मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर लगाए गए बोहतानों का जवाब अल्लाह तआला ने ख़ुद देकर आपका बचाव किया। 43. मुहम्मद अलैहिस्सलाम की उम्मत की तादाद दूसरे नबियों की उम्मतों की कुल तादाद से ज़्यादा है। ये उनसे ज़्यादा बरतर और ज़्यादा इज़्ज़त वाले हैं। हदीसों में बताया गया है कि जन्नत में जाने वालों में से दो-तिहाई इसी उम्मत से होंगे। 44. रसूलुल्लाह को दिए जाने वाले सवाब दूसरे नबियों को दिए जाने वाले सवाबों से कई गुना ज़्यादा हैं।

जो शख़्स कोई मक़बूल इबादत या भलाई का काम करे, उसे जितना सवाब दिया जाता है, उतना ही उसके उस्ताद को भी दिया जाएगा। उस्ताद के उस्ताद को चार गुना, उसके उस्ताद को आठ गुना, उसके भी उस्ताद को सोलह गुना – इस तरह रसूलुल्लाह तक हर उस्ताद को अपने शागिर्द से दोगुना सवाब दिया जाएगा। मसलन बीसवें उस्ताद को 5,24,288 सवाब दिए जाएँगे। मुहम्मद अलैहिस्सलाम को आपकी उम्मत के हर शख़्स के हर काम का सवाब दिया जाएगा।

अगर इस हिसाब से सोचा जाए कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम को हर काम पर कितने सवाब दिए जाएँगे, तो उन सबकी मिक़दार अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता। बताया गया है कि सलफ़-ए-सालिहीन बाद में आने वालों से ज़्यादा अफ़ज़ल और ज़्यादा बरतर हैं। सवाब की तादाद के लिहाज़ से यह बरतरी ज़ाहिर है। 45. आपको नाम लेकर पुकारना, आपके पास ऊँची आवाज़ से बोलना, दूर से आपको आवाज़ देना और रास्ते में आपसे आगे निकलना हराम किया गया है। दूसरे नबियों की उम्मतें अपने नबियों को उनके नाम से पुकारती थीं। 46. आपने जिबराईल अलैहिस्सलाम को फ़रिश्ते की शक्ल में दो बार देखा। किसी और नबी ने उन्हें उनकी असली शक्ल में नहीं देखा। 47. आपके पास जिबराईल अलैहिस्सलाम चौबीस हज़ार बार आए। दूसरे नबियों में सबसे ज़्यादा मूसा अलैहिस्सलाम के पास आए; यह आना चार सौ बार हुआ।

“जो मेरे अहले बैत से दुश्मनी करे, वह मुनाफ़िक़ (दोग़ला) है” हदीस शरीफ़

48. इसराफ़ील अलैहिस्सलाम भी मुहम्मद अलैहिस्सलाम के पास बहुत बार आए। दूसरे नबियों (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) के पास सिर्फ़ जिबराईल अलैहिस्सलाम आए। 49. अल्लाह तआला को मुहम्मद अलैहिस्सलाम का वास्ता देकर क़सम देना जाइज़ है, दूसरे नबियों और फ़रिश्तों का वास्ता देकर जाइज़ नहीं। 50. मुहम्मद अलैहिस्सलाम के बाद आपकी अज़वाज से दूसरों का निकाह करना हराम किया गया, और इस लिहाज़ से बताया गया कि वे मोमिनों की माएँ हैं।

दूसरे नबियों (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) की बीवियाँ या तो उनके लिए नुक़सानदेह रहीं या बेफ़ायदा। मुहम्मद अलैहिस्सलाम की मुबारक अज़वाज (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुन्न) ने दुनिया और आख़िरत के कामों में आपकी मदद की, ग़रीबी पर सब्र किया, शुक्र किया और इस्लाम फैलाने में बहुत ख़िदमत की। 51. नसब और सबब, यानी ख़ून और निकाह की रिश्तेदारी का क़यामत में कोई फ़ायदा नहीं। रसूलुल्लाह के रिश्तेदार इससे मुस्तसना हैं। 52. रसूलुल्लाह का नाम रखना दुनिया और आख़िरत में फ़ायदेमंद है। आपका नाम रखने वाले सच्चे मोमिन जहन्नम में नहीं जाएँगे। 53. आपकी हर बात, हर काम सही है। आपके हर इज्तिहाद की अल्लाह तआला की तरफ़ से तस्दीक़ की जाती है। 54. आपसे मुहब्बत करना हर एक पर फ़र्ज़ है। आपने फ़रमाया: “जो अल्लाह तआला से मुहब्बत करता है, वह मुझसे मुहब्बत करता है।” आपसे मुहब्बत की निशानी आपके दीन, आपके रास्ते, आपकी सुन्नत और आपके अख़लाक़ की पैरवी करना है। क़ुरआन-ए-करीम में आपको हुक्म दिया गया कि यह फ़रमाएँ: “अगर तुम मेरी पैरवी करो, तो अल्लाह तआला तुमसे मुहब्बत करेगा।”

55. आपके अहले बैत से मुहब्बत करना वाजिब है। आपने फ़रमाया: “जो मेरे अहले बैत से दुश्मनी करे, वह मुनाफ़िक़ (दोग़ला) है।” अहले बैत आपके वे रिश्तेदार हैं जिनके लिए ज़कात लेना हराम है। ये आपकी अज़वाज और आपके दादा हाशिम की नस्ल से होने वाले मोमिन हैं, यानी अली, अक़ील, जाफ़र तय्यार और अब्बास की नस्ल वाले।

56. आपके तमाम सहाबा से मुहब्बत करना वाजिब है। आपने फ़रमाया: “मेरे बाद मेरे सहाबा से दुश्मनी न करना! उनसे मुहब्बत करना मुझसे मुहब्बत करना है। उनसे दुश्मनी करना मुझसे दुश्मनी करना है। जिसने उन्हें तकलीफ़ दी, उसने मुझे तकलीफ़ दी। और जिसने मुझे तकलीफ़ दी, वह अल्लाह तआला को तकलीफ़ देता है। अल्लाह तआला अपने को तकलीफ़ देने वाले को अज़ाब देगा।”

57. अल्लाह तआला ने मुहम्मद अलैहिस्सलाम के लिए आसमान में दो और ज़मीन में दो मददगार पैदा किए। ये जिबराईल, मीकाईल, अबू बकर और उमर (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) हैं।10 58. मर्द हो या औरत, बड़ी उम्र में मरने वाले हर शख़्स से क़ब्र में मुहम्मद अलैहिस्सलाम के बारे में पूछा जाएगा। जिस तरह “तेरा रब कौन है?” पूछा जाएगा, उसी तरह “तेरा नबी कौन है?” भी पूछा जाएगा। 59. मुहम्मद अलैहिस्सलाम की हदीसें पढ़ना इबादत है। पढ़ने वाले को सवाब दिया जाता है।

हदीस शरीफ़ पढ़ने के लिए वुज़ू करना, पाक कपड़े पहनना, ख़ुशबू लगाना, हदीस शरीफ़ की किताब को ऊँची जगह पर रखना, पढ़ने वाले का बाहर से आने वालों के लिए खड़ा न होना और सुनने वालों का आपस में बात न करना मुस्तहब है। हदीसें लगातार पढ़ने वालों के चेहरे नूरानी, चमकदार और ख़ूबसूरत होते हैं। क़ुरआन-ए-करीम पढ़ते वक़्त भी इन आदाब का ख़याल रखना ज़रूरी है। 60. आपकी मुबारक रूह क़ब्ज़ करने के लिए इज़राईल अलैहिस्सलाम इंसान की शक्ल में आए और अंदर आने की इजाज़त माँगी। 61. आप अपनी क़ब्र में ऐसी ज़िंदगी के साथ ज़िंदा हैं जिसे हम नहीं जानते। क़ब्र में क़ुरआन-ए-करीम पढ़ते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं। (तमाम नबी भी ऐसे ही हैं।) 62. दुनिया के हर कोने में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर दुरूद पढ़ने वाले मुसलमानों को सुनने वाले फ़रिश्ते आपकी क़ब्र पर आकर आपको ख़बर देते हैं। हर दिन हज़ारों फ़रिश्ते आपकी क़ब्र की ज़ियारत करते हैं। 63. आपकी क़ब्र के अंदर की मिट्टी हर जगह से, काबा से और जन्नतों से भी अफ़ज़ल है। 64. आपकी उम्मत के अमल और इबादतें हर सुबह और शाम आपके सामने पेश की जाती हैं। आप उन्हें करने वालों को भी देखते हैं और गुनाह करने वालों की माफ़ी के लिए दुआ करते हैं। 65. आपकी क़ब्र की ज़ियारत औरतों के लिए भी मुस्तहब है। दूसरी क़ब्रों की ज़ियारत उनके लिए सिर्फ़ उस वक़्त जाइज़ है जब वहाँ लोग कम हों, और वह भी मुसलमान औरत के लायक़ लिबास में। 66. जिस तरह आपकी ज़िंदगी में था, उसी तरह आपकी वफ़ात के बाद भी दुनिया में हर जगह, हर वक़्त आपसे तवस्सुल करने वालों, यानी आपके वास्ते और आपकी हुरमत के सदक़े माँगने वालों की दुआ अल्लाह तआला क़बूल फ़रमाता है।

एक देहाती आपकी क़ब्र-ए-मुबारक के पास आया और कहा: “या रब! तूने ग़ुलाम आज़ाद करने का हुक्म दिया है। यह तेरे नबी हैं, और मैं तेरे ग़ुलामों में से एक हूँ। अपने नबी के वास्ते मुझे जहन्नम की आग से आज़ाद कर दे!” तो यह आवाज़ सुनाई दी: “ऐ मेरे बंदे! तूने सिर्फ़ अपनी आज़ादी क्यों माँगी? मेरे तमाम बंदों की आज़ादी क्यों नहीं माँगी? जा! मैंने तुझे जहन्नम से आज़ाद कर दिया।”

मशहूर औलिया में से हातिम असम ने रसूलुल्लाह की क़ब्र-ए-मुबारक के पास खड़े होकर कहा: “या रब! मैंने तेरे नबी की क़ब्र की ज़ियारत की। मुझे ख़ाली हाथ न लौटा!” तो यह आवाज़ सुनाई दी: “ऐ मेरे बंदे! मैंने अपने हबीब की क़ब्र की तेरी ज़ियारत क़बूल की। तेरी और तेरे साथ ज़ियारत करने वालों की मग़फ़िरत कर दी।”

इमाम अहमद क़स्तल्लानी (रहमतुल्लाहि अलैहि) बयान करते हैं: “मैं कई साल एक बीमारी में मुब्तला रहा। तबीब उसका इलाज न ढूँढ सके। मक्का में एक रात मैंने रसूलुल्लाह से बहुत फ़रियाद की। उसी रात ख़्वाब में एक शख़्स को देखा। उसके हाथ के काग़ज़ पर मैंने पढ़ा: ‘यहाँ रसूलुल्लाह की इजाज़त से अहमद क़स्तल्लानी की बीमारी का इलाज लिखा गया है।’ जब जागा, तो मेरी बीमारी ख़त्म हो चुकी थी।” क़स्तल्लानी यह भी बयान करते हैं: “एक बेचारी लड़की को मिर्गी की बीमारी हो गई थी। उसके ठीक होने के लिए मैंने रसूलुल्लाह से बहुत फ़रियाद की। ख़्वाब में एक शख़्स उस जिन्न को मेरे पास लाया जिसने लड़की को बीमार किया था, और कहा: ‘इसे रसूलुल्लाह ने तुम्हारे पास भेजा है।’ मैं उस जिन्न से नाराज़ हुआ, उस पर चिल्लाया। उसने मुझसे क़सम खाई कि लड़की को तकलीफ़ नहीं देगा, और मैं जाग गया। फिर मुझे ख़बर मिली कि लड़की मिर्गी की बीमारी से छुटकारा पा चुकी है।”

67. क़यामत के दिन क़ब्र से सबसे पहले रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उठेंगे। आपके ऊपर जन्नत का लिबास होगा। बुराक़ पर सवार होकर महशर के मैदान में जाएँगे। आपके हाथ में “लिवाउल हम्द” नाम का झंडा होगा। नबी और तमाम इंसान इसी झंडे के नीचे होंगे। हज़ार साल इंतिज़ार करने से सब बहुत परेशान हो जाएँगे। लोग बारी-बारी आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा और ईसा नबियों (अलैहिमुस्सलाम) के पास जाकर दरख़्वास्त करेंगे कि हिसाब शुरू होने के लिए शफ़ाअत करें। उनमें से हर एक उज़्र बयान करेंगे, कहेंगे कि वह अल्लाह तआला से शरमाते और डरते हैं, और शफ़ाअत करने से बचेंगे। फिर जब लोग रसूलुल्लाह के पास जाकर फ़रियाद करेंगे, तो आप सज्दे में जाकर दुआ करेंगे और आपकी शफ़ाअत क़बूल होगी। सबसे पहले आपकी उम्मत का हिसाब होगा, सबसे पहले वही पुल-सिरात से गुज़रेंगे और सबसे पहले जन्नत में दाख़िल होंगे। जहाँ भी जाएँगे, हर जगह को रौशन कर देंगे।

हज़रत फ़ातिमा जब सिरात से गुज़रेंगी, तो कहा जाएगा: “सब अपनी आँखें बंद कर लें! मुहम्मद अलैहिस्सलाम की बेटी आ रही हैं।”

68. जन्नत में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मक़ाम का नाम वसीला है। यह जन्नत का सबसे ऊँचा दर्जा है। जन्नत में हर एक की तरफ़ अपनी एक-एक शाख़ फैलाने वाले सिदरतुल मुंतहा के पेड़ की जड़ वहीं है। जन्नत वालों को नेमतें इन्हीं शाख़ों से आएँगी।

69. आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने में नमाज़ के लिए दी जाने वाली अज़ान में मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नाम भी लिया जाता था।

70. तौरात, इंजील और ज़बूर में मुहम्मद अलैहिस्सलाम, आपके चार ख़लीफ़ा, आपके सहाबा और आपकी उम्मत के कुछ लोगों को अच्छी सिफ़ात के साथ बयान किया गया और उनकी तारीफ़ की गई। अल्लाह तआला ने अपने नाम महमूद से “मुहम्मद” लफ़्ज़ निकालकर अपने हबीब का नाम रखा। अल्लाह तआला ने अपने नामों में से रऊफ़ और रहीम नाम अपने हबीब को भी अता फ़रमाए। 71. तीन साल की उम्र में, चालीस साल की उम्र में नुबुव्वत की ख़बर दिए जाने के वक़्त और बावन साल की उम्र में मेराज पर ले जाए जाते वक़्त फ़रिश्तों ने आपका सीना चाक किया। जन्नत से लाए हुए तश्त में जन्नत के पानी से आपका दिल धोया। 72. आपने सौर (बैल) बुर्ज के पास “सुरय्या” नाम के सितारों के झुरमुट के सात सितारों को अपनी आँखों से देखकर उनकी तादाद बताई थी। इस झुरमुट को परवीन और उलकर भी कहा जाता है। 73. कुछ लोगों ने आपके हिजामा का ख़ून पी लिया। जब एक ने उसे पिया, तो आपने फ़रमाया: “जहन्नम की आग इसे नहीं जलाएगी।” 74. आपके बड़े मोजिज़ों में से एक आपका मेराज पर ले जाया जाना है। बुराक़ नाम की जन्नत की सवारी पर आपको मक्का से बैतुल मुक़द्दस ले जाया गया। वहाँ से आसमानों और अर्श पर ले जाया गया। आपको अजीब-अजीब चीज़ें दिखाई गईं। आपने अल्लाह तआला को सिर की आँखों से, ऐसे तरीक़े से देखा जिसे जाना नहीं जा सकता। (लेकिन यह देखना माद्दी दुनिया से बाहर, यानी आख़िरत के आलम में हुआ।) एक पल में आप फिर अपने घर वापस लाए गए। मेराज का मोजिज़ा किसी और नबी को नहीं दिया गया।

75. उम्र भर में एक बार आप पर दुरूद और सलाम पढ़ना आपकी उम्मत पर फ़र्ज़ हुआ। अल्लाह तआला और फ़रिश्ते भी आप पर दुरूद और सलाम भेजते हैं।

“मैं बंदा नबी होना चाहता हूँ” हदीस शरीफ़

76. रात में, जागते हुए, सोते हुए, अकेले, भीड़ में, सफ़र में, घर में, जंग में, हँसते हुए, रोते हुए – आपका मुबारक दिल हमेशा अल्लाह तआला के साथ था। कुछ वक़्तों में तो सिर्फ़ अल्लाह तआला के साथ था।

दुनिया की ज़िम्मेदारियाँ अदा करने और अपने मुबारक दिल को इंसानी दुनिया की तरफ़ मोड़ने के लिए आप अपनी ज़ौजा आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के पास आकर फ़रमाते: “ऐ आइशा! थोड़ी देर मुझसे बात करो (ताकि मैं अपने आप में आ जाऊँ)”, इसके बाद अपने सहाबा को नसीहत और हिदायत करने तशरीफ़ ले जाते थे। फ़ज्र की सुन्नत घर में पढ़कर और आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से कुछ देर बात करके सहाबा को फ़र्ज़ पढ़ाने के लिए मस्जिद तशरीफ़ ले जाते थे। यह हाल नबी की ख़ुसूसियात में से है। अगर आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से बात किए बग़ैर बाहर तशरीफ़ ले जाते, तो इलाही तजल्लियों और नूरों की वजह से कोई आपके चेहरे की तरफ़ देख न पाता। 77. आपने रुतबा और सल्तनत नहीं चाही, नुबुव्वत और फ़क़ीरी चाही। एक सुबह जिबराईल अलैहिस्सलाम से बात करते हुए आपने फ़रमाया कि आज रात हमारे घर में खाने का एक लुक़मा भी नहीं था। उसी वक़्त इसराफ़ील अलैहिस्सलाम आए और कहा: “अल्लाह तआला ने आपकी बात सुनी और मुझे भेजा है। अगर आप चाहें, तो जिस पत्थर को भी आप हाथ लगाएँ, वह सोना, चाँदी या ज़मुर्रद बन जाए। अगर चाहें, तो बादशाह नबी बन जाएँ।” रसूलुल्लाह ने तीन बार फ़रमाया: “मैं बंदा नबी होना चाहता हूँ।”

78. दूसरे नबी (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) एक मुक़र्रर ज़माने में, एक मुक़र्रर मुल्क में नबी रहे। मुहम्मद अलैहिस्सलाम को ज़मीन के तमाम इंसानों और जिन्नों के लिए क़यामत तक नबी बनाकर भेजा गया है। ऐसे आलिम भी हैं जिन्होंने बताया है कि आप फ़रिश्तों, जानवरों, पेड़-पौधों और बेजान चीज़ों के, मुख़्तसर यह कि तमाम मख़लूक़ात के नबी हैं।

79. आपकी रहमत और फ़ायदा तमाम मौजूदात पर फैला हुआ है। मोमिनों के लिए आपका फ़ायदा ज़ाहिर है। दूसरे नबियों (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) के ज़माने के काफ़िरों पर दुनिया ही में अज़ाब आते और वे मिटा दिए जाते थे। आप पर ईमान न लाने वालों पर दुनिया में अज़ाब नहीं आया। एक दिन आपने जिबराईल अलैहिस्सलाम से फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने बताया कि मैं सारे जहानों के लिए रहमत हूँ। क्या मेरी रहमत से तुम्हें भी हिस्सा मिला?” जिबराईल ने कहा: “अल्लाह की बड़ाई और हैबत के सामने मैं हमेशा इस डर में रहता था कि मेरा अंजाम क्या होगा। जब मैं वे आयतें (सूरह तकवीर की बीसवीं और इक्कीसवीं आयतें) लाया जो बताती हैं कि मैं अमीन हूँ, तो इस तारीफ़ से मैं उस सख़्त डर से छूट गया और मुझे इत्मीनान मिल गया। क्या इससे बड़ी कोई रहमत होगी?” 80. अल्लाह तआला ने चाहा कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम राज़ी हों। (जैसा कि हमने पैंतीसवीं फ़ज़ीलत में बताया, अल्लाह तआला आपको आपके राज़ी होने तक वह देगा जो आप चाहें। यह बात सूरह ज़ुहा में बताई गई है।)

81. “मवाहिब-ए-लदुन्निया” किताब में बताया गया है कि यह हदीस मशहूर है: “मैंने अपने रब से माँगा कि मेरी उम्मत गुमराही पर इकट्ठा न हो। उसने क़बूल फ़रमाया।”

एक और हदीस शरीफ़ में आपने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने तुम्हें तीन चीज़ों से महफ़ूज़ रखा है। उनमें से पहली यह कि तुम्हें गुमराही पर इकट्ठा होने से बचाया। दूसरी यह कि छूत की (एक से दूसरे को लगने वाली) बीमारी से मरने वाला शहीद का सवाब पाता है। तीसरी यह कि अगर दो नेक मुसलमान किसी मुसलमान के बारे में ‘वह अच्छा है’ (हम उसे अच्छा जानते हैं) कहकर गवाही दें, तो वह मुसलमान जन्नत में जाता है।”

एक हदीस शरीफ़ में आपने फ़रमाया: “मेरे सहाबा का इख़्तिलाफ़ तुम्हारे लिए रहमत है” और “मेरी उम्मत का इख़्तिलाफ़ (अमल में मज़हबों में बँट जाना) रहमत है।” आपकी उम्मत हक़ और सही बात तलाश करने की कोशिश में इख़्तिलाफ़ में पड़ती है, और उनकी यह कोशिश रहमत का सबब बनती है। इस हदीस शरीफ़ का दो लोगों ने इनकार किया है: एक माजिन, दूसरा मुलहिद। माजिन वह मक्कार है जो दीन को दुनिया कमाने का ज़रिया बनाता है, और मुलहिद वह गुमराह है जो आयात-ए-करीमा को दुनियावी फ़ायदों के मुताबिक़ मायने देकर काफ़िर हो जाता है। यह्या इब्ने सईद कहते हैं: इस्लामी आलिम आसानी पैदा करने वाले हैं। एक काम को एक ने हलाल कहा है, दूसरे ने हराम। नेक लोगों के लिए जिसे हलाल कहा, फ़साद के ज़माने में उसे हराम कहा है। ऊपर की हदीसें बताती हैं कि इज्मा-ए-उम्मत, यानी मुज्तहिद कहलाने वाले आलिमों का इत्तिफ़ाक़, अदिल्ला-ए-शरइय्या में से है। यानी यह दीनी इल्म के चार माख़ज़ों में से एक है, और चारों मज़हब हक़ हैं। मज़हब मुसलमानों के लिए अल्लाह तआला की रहमत हैं। 82. रसूलुल्लाह की मुबारक बेटियाँ और अज़वाज (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुन्न) दुनिया की औरतों में सबसे अफ़ज़ल हैं। आपके तमाम सहाबा भी नबियों के बाद तमाम इंसानों में सबसे अफ़ज़ल हैं। आपके शहर मक्का मुकर्रमा और फिर मदीना मुनव्वरा ज़मीन की सबसे क़ीमती जगहें हैं। आपकी मुबारक मस्जिद में पढ़ी गई एक रकअत नमाज़ पर हज़ार रकअत का सवाब लिखा जाता है। दूसरी इबादतों का भी यही हाल है।

आपकी क़ब्र और मिम्बर के बीच की जगह जन्नत का बाग़ है। आपने फ़रमाया:

“जिसने मेरी वफ़ात के बाद मेरी ज़ियारत की, वह ऐसा है जैसे उसने मेरी ज़िंदगी में मेरी ज़ियारत की। हरमैन में से किसी एक में मरने वाला मोमिन क़यामत के दिन अमन की हालत में उठाया जाएगा।” मक्का और मदीना शहरों को हरमैन कहा जाता है। 83. हर एक की नस्ल बेटे से चलती है। मुहम्मद अलैहिस्सलाम की नस्ल आपकी बेटी फ़ातिमा से चली है। यह बात एक हदीस शरीफ़ में भी बताई गई है। 84. हर इंसान का जिन्नों में से एक साथी होता है। यह शैतान काफ़िर है। वसवसे डालकर इंसान का ईमान छीनने और उससे गुनाह कराने की कोशिश करता है। रसूल अलैहिस्सलाम अपने साथी जिन्न को ईमान पर ले आए।

85. जब रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के इंतिक़ाल का वक़्त आया, तो जिबराईल अलैहिस्सलाम आए, अल्लाह तआला की तरफ़ से सलाम लाए और बताया कि अल्लाह तआला ने आपका हाल पूछा है। उन्होंने आपके इंतिक़ाल की ख़बर दी और आपके लिए और आपकी उम्मत के लिए बहुत सी ख़ुशख़बरियाँ दीं।

आपके क़दमों की ख़ाक के बदले जहान भी न लूँ, या रसूलल्लाह!
आपके एक बाल के बदले सातों आसमान भी न लूँ, या रसूलल्लाह!
सिद्दीक़ की तलब बस आपकी एक भूल है, या रसूलल्लाह!
इरफ़ान की मुराद आपके क़दमों की ख़ाक बनना है, या रसूलल्लाह!